10 January 2016

यही है हमारा बिलासपुर

हमारा बिलासपुर :

जहां लोग बसते हैं, वहाँ बस्तियाँ बस जाती हैं। आम तौर पर बस्तियाँ वहाँ रूप लेती हैं जहां पानी उपलब्ध होता है। खोड्री के पहाड़ से निकली एक बरसाती नदी अरपा अपने आसपास मनुष्यों की आबादी को निमंत्रित करती हुई बहती रही और उसके पावन जल के आसरे लोग सदियों से जीते आ रहे हैं। उद्गम से लगभग 80 किलोमीटर दूर अरपा नदी का पाट बहुत चौड़ा हो जाता है, वहां उसके दोनों छोर पर लोग अपने घर बनाकर बस गए जिसे अब सब बिलासपुर कहते हैं।

कहते हैं, बिलासा नाम की मछुआरिन के नाम पर इस बस्ती का नामकरण हुआ। यह बात दिल को खुशी देता है कि एक स्त्री को शहर के नामकरण का सौभाग्य मिला। अरपा नदी के किनारे बसी यह छोटी सी बस्ती दिनों-दिन पसरती जा रही है, किसी दानव की मानिंद अपने अगल-बगल की उपजाऊ जमीन को लीलते हुए क्रांकीट के मकानों की शक्ल ले रही है। धान की उपज देने वाले खेत अब धन उगल रहे हैं। बिलासपुर में वे लोग अब नहीं रहते जो रहते थे, होते थे; अब इस शहर में ऐसे लोग रहते हैं जो न होने के बराबर हैं। हर इन्सान अकेला रहता है, अपने घर में भी अकेला रहता है। पहले ऐसा न था, सब एक साथ रहते थे, पूरी बस्ती किसी अविभाजित संयुक्त परिवार की तरह एक-दूसरे से हिल-मिल कर रहती थी।     

छत्तीसगढ़ी भाषा में 'जूना' का अर्थ है, पुराना।  जानकार लोगों का अनुमान है कि सबसे पुरानी बस्ती अरपा नदी के किनारे पचरीघाट के आसपास बसी होगी जिसका विस्तृत क्षेत्र जूनाबिलासपुर कहलाता है। यहाँ सभी जाति और व्यवसाय के लोग रहते हैं, पुरानी शैली के घर हैं, पतली गलियां हैं और पुराना रहन-सहन भी। किसी जमाने में यहाँ घरेलू वस्तुओं के कुटीर उद्योग थे। आवागमन के साधन नहीं थे इस कारण सब लोग स्थानीय उत्पादन पर आश्रित थे। कोष्टापारा में कपड़े बुने जाते थे, कुम्हारपारा में मिट्टी के बर्तन बनते थे। तेलीपारा में घानी की मदद से तेल निकाला जाता था, काछीपारा में सब्जी उगाई जाती थी। पारा का अर्थ है मोहल्ला जो बांग्ला भाषा के 'पाड़ा' से प्रभावित लगता है। घसियापारा, डबरीपारा, जबड़ापारा, चाटापारा, मगरपारा, इमलीपारा, तालापारा, लोधीपारा, ईरानीपारा, केवटपारा, नाऊपारा, गोंडपारा, बंगालीपारा, बरछापारा, कतियापारा, ब्राह्मणपारा, टिकरापारा, तारबाहर, शनीचरी पड़ाव आदि पुराने मोहल्लों के नाम वहाँ के व्यापार, रोजगार या समूह के आधार पर रखे गए समझ आते हैं। तोरवा, कर्बला, सरकंडा, चाटीडीह, दयालबंद, मसानगंज, खपरगंज, जूनीलाईन, कुदूदंड, जरहाभाटा आदि अनेक प्राचीन मोहल्ले हैं लेकिन इनके नाम के गुणसूत्र का पता नहीं है, ये मोहल्ले अब भी बड़ी शान से कायम हैं।

बिलासपुर सन 1861 के पूर्व छत्तीसगढ़ आठ तहसीलों और जमींदारियों के रूप में रायपुर से प्रशासित होता था। सन 1861 में किये गए प्रशासनिक परिवर्तन के फलस्वरूप बिलासपुर को एक नए जिले का रूप दिया गया। वर्तमान सिटी कोतवाली में बंदोबस्त अधिकारी का कार्यालय बनाया गया। गोलबाजार उस समय जिला कचहरी था। कंपनी गार्डन उन दिनों ईस्ट इण्डिया कंपनी की गारद (परेड) के लिए उपयोग में लाया जाता था। सन 1919 में मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार के फलस्वरूप एक नया प्रदेश अस्तित्व में आया जिसे सेन्ट्रल प्रोविंस का नाम दिया गया। इसमें वर्तमान महाराष्ट्र के चार जिले, महाकोशल के अठारह जिले और साथ में छत्तीसगढ़ को भी जोड़ा गया।

राष्ट्र के राजनीतिक क्षितिज में महात्मा गाँधी का उदय हो चुका था, उनकी प्रेरणा से देश की आजादी का आन्दोलन दिनोंदिन जोर पकड़ रहा था। असहयोग आन्दोलन के दौरान राष्ट्रप्रेम की लहर बिलासपुर में भी दौड़ने लगी और कुछ लोग खुलकर सामने आने लगे। 25 नवम्बर 1933 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी बिलासपुर आये। उन्हें देखने और सुनने के लिए दूर-सुदूर से हजारों की संख्या में लोग पैदल और बैलगाड़ियों में भरकर सभास्थल में उमड़ पड़े। सभा समाप्त होने के बाद लोग उनकी स्मृति के रूप में मंच में लगी ईंट और मिट्टी तक अपने साथ उठाकर ले गए।

एक समय का गाँव बिलासपुर, अंग्रेजों के शासन काल में जिला बनने के बाद कस्बा बना फिर अर्धनगर, उसके बाद नगर और अब अर्ध-महानगर बन गया है। यहाँ तक की यात्रा लगभग डेढ़ सौ वर्ष में पूरी हुई। इस नगर की धरती को असंख्य लोगों ने अपने परिश्रम से सींचकर हरा-भरा किया, इसमें संस्कार के धागे बुने। बहुत से अनाम हैं जिन्हें कोई नहीं जानता लेकिन कुछ नामचीन भी हैं जिन्हें भारतवर्ष जानता है जैसे रंगकर्मी पंडित सत्यदेव दुबे, नाट्यलेखन के सशक्त हस्ताक्षर डॉ.शंकर शेष और साहित्यकार श्रीकांत वर्मा जैसी मशहूर हस्तियाँ, इसी बिलासपुर की माटी की देन हैं। इसी शहर में जन्मे हाकी खिलाड़ी लेस्ली क्लाडियस भारतीय हाकी टीम में लंदन ओलिम्पिक (1948 : स्वर्ण पदक), हेलसिंकी ओलिंपिक (1952 : स्वर्ण पदक), मेलबर्न ओलिम्पिक (1956 : स्वर्ण पदक), रोम ओलिम्पिक (1960 : कप्तान : रजत पदक) खेलों में एक खिलाड़ी के रूप में शामिल रहे. इन्हें सन 1971 में पद्मश्री सम्मान प्राप्त हुआ। एक और, काशीराम रजक अखिल भारतीय स्तर के हाकी खिलाड़ी रहे हैं जिनका तोक्यो ओलिम्पिक (1964) की टीम में चयन हो चुका था लेकिन खेल-राजनीति के चलते उनका नाम हटा दिया गया. 

अंग्रेजों ने बंबई से कलकत्ता तक रेल्वे की लंबी लाइन बिछाई, बिलासपुर बीच में आ गया। सन 1889 में यहाँ रेल्वे स्टेशन बनाया गया। स्टेशन के आसपास का बहुत बड़ा भूखंड रेल्वे को आबंटित किया गया जिसे 'रेल्वे कालोनी' कहा जाने लगा। यहाँ दूर तक जाती रेल की पांतों के अलावा रेल कर्मियों के लिए आवासीय घर, खेल के मैदान और क्लब बने। शुरुआत में रेलकर्मियों के रूप में लाल रंग के चेहरे लिए कुछ अंग्रेज़ आए जो लाल रंग के वृहदाकार 'बंगले' में रहते थे। दूर-सुदूर बंगाल, आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, उत्तरप्रदेश आदि राज्यों के भारतीय रेल्वे की नौकरी में यहाँ आए जो मध्यम और छोटे घरों में व्यवस्थित किए गए। इनकी दैनिक जरूरतों की आपूर्ति के लिए बुधवारी बाज़ार बनाया गया जहां अनाज, किराना, कपड़ा, सब्जी आदि उपलब्ध थे। रेल्वेकर्मियों के इस समूह ने बिलासपुर को गाँव से शहर में तब्दील करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बिलासपुर के देहातीपन को इन प्रवासियों ने बदल दिया और यह बस्ती शहर बनाने की राह पर चल पड़ी।

तब बिलासपुर एक कस्बा था। कलेक्टोरेट था, कचहरी, बैंक, अस्पताल और सिनेमा थे। आसपास के डेढ़ सौ किलोमीटर तक के लोग बिलासपुर आते थे, ट्रेन में घुसकर, बस में लदकर, बैलगाड़ी में बैठकर या घोड़े पर चढ़कर। बिलासपुर आना और काम निपटाना उनके लिए परेशानी का सबब रहा होगा लेकिन काम पूरा होने के बाद का समय पिकनिक जैसा था। यहाँ के हलवाइयों की दूकानें और सिनेमाघर इन प्रवासियों के दिन भर का अर्जित सारा संताप हर लिया करते थे।

सबसे बड़ा परिवर्तन तब आया जब बिलासपुर के हृदयस्थल पर गोलबाज़ार का निर्माण हुआ। सन 1937 में दिल्ली के कनाटप्लेस की शैली में नगरपालिका ने इसका निर्माण कराया। बड़ी और पक्की दूकानों का सिलसिला यहीं से शुरू हुआ जो पूरी बस्ती के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया। गोलबाज़ार केवल बाज़ार नहीं, बिलासपुर का वैभव था, शहर का रक्त इसी धमनी से होकर गुजरता था। मिठाई और दूध-दही, साइकिल और सिलाई मशीन, सब्जी और फल, कपड़े और मनिहारी, कापी-किताब और खाता-बही, बीड़ी-सिगरेट और पान याने वह सब-कुछ जो नगरवासियों को चाहिए होता था, अच्छे से अच्छा, वह गोलबाजार की दूकानों में मिलता था। गोलबाजार के पाँच किलोमीटर के वृत्त के लोग साइकल पर हाँफते हुए यहाँ अपना झोला लटकाए आते और झोला भरकर खुशी-खुशी वापस जाते।

गोलबाजार की मिठाई और चाट की दूकानें सबको रोज आने के लिए मजबूर करती। यहाँ एक मिठाई की दूकान थी- गयाप्रसाद पान्डे महराज की। किसी जमाने में उस होटल में सुबह छः बजे से रात दस बजे तक ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी। अल-सुबह जलेबी की तई भट्ठी पर चढ़ती तो रात तक अनवरत मीठी-रसीली जलेबी उगलती रहती जिसे निगलने के लिए पूरे होटल में पसरी गंदगी और बदबू को दुर्लक्ष्य कर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती। जलेबी के साथ स्वादवृद्धि के लिए दो नमकीन भी थे। एक- आलू और प्याज को भूंज कर बनाए गए मसाले के ऊपर बेसन लपेट कर तला गया ‘आलूबड़ा' और दूसरा- बेसन और मिर्च मसाला मिला कर तेज लहसुन की छौंक से तैयार किया गया 'प्याज बड़ा'। जलेबी के साथ इनका 'काम्बिनेशन' इस कदर जायकेदार होता था कि मजा आ जाता। नाश्ते की ये तीनों वस्तुएं जब तैयार होती तो इनकी खुशबू इतनी फैलती कि सड़क चलता इन्सान सम्मोहित सा होटल में खिंचा चला आता। 

एक चलती-फ़िरती दूकान भी थी, रबड़ी वाले बाबा की. उनका नाम शायद महादेव प्रसाद था। गोंडपारा वाले अपने घर से निकलकर वे गोलबाज़ार तक शाम को पांच बजे रबड़ी बनाकर सड़क पर आवाज़ देते निकलते- ‘ताज़ी रबड़ी.....बासी पेड़ा...’ और एक नगरपालिका द्वारा निर्मित एक खाली पड़ी दूकान पर बैठ जाते। उनकी रबड़ी के दीवाने आते, पत्ते के दोने में रबड़ी लेते और अपनी उंगलियों से उठाकर खाते या दोने को मुंह से लगापर रबड़ी को पी लेते। बाबा की रबड़ी का सोंधापन जितना अनोखा था, बाबा भी उतने ही अनोखे थे। उनको यदि किसी की मृत्यु का समाचार मिल जाता तो वे अपना काम छोड़्कर उसके अंतिम संस्कार में पहुंच जाते, रबड़ी बने या न बने। रबड़ी वाले बाबा का कोई घर भी न था, एक मंदिर के बरामदे में सोते। उन्होने कोने में एक छोटी-सी भट्ठी बना ली थी जिसमें प्रतिदिन वे रबड़ी तैयार करते। ये काम वे इसलिए करते ताकि किसी के सामने हाथ न फ़ैलाना पड़े और स्वाभिमानपूर्वक जिया जा सके। 

जगदीशनारायण की दूकान 'पेंड्रावाला' में सभी वस्तुएँ देशी घी से बनाई जाती थी, मिठाई, नमकीन और पूरी- सब्जी। पूरी-सब्जी की लोकप्रियता का आलम ऐसा था कि बिलासपुर के आसपास सौ-पचास मील दूर बैठे किसी व्यक्ति को अगर पूरी-सब्जी की याद आ गई तो वह अगले दिन बिलासपुर जाने के लिए कोई न कोई बहाना अवश्य खोजता, जैसे, कचहरी में पेशी है, कलेक्टर आफिस जाना है, आर॰टी॰ओ॰ का काम है, डाक्टर को दिखाना है, खरीदी करना है, बैंक में काम है आदि कुछ भी काम 'खोजा' जाएगा और उसे बिलासपुर जाने वाली अगली ट्रेन या बस में बैठकर रवाना होना ही है। बिलासपुर पहुँच कर खोजा गया काम बाद में होगा, पहले  'पेंड्रावाला' में पूरी-सब्जी का आस्वादन होगा क्योंकि घर से निकल-भागने का असली मकसद पहले पूरा होना चाहिए। इसी दुकान में शहर की पहली आइसक्रीम की मशीन लगाई गयी थी जिसने नगरवासियों को 'साफ्टी' आइसक्रीम से परिचित करवाया. 

यही हाल मौसाजी, इलाहाबादी, दामू और होरीलाल की चाट का था। इनकी चाट ऐसी थी कि शहर भर को लुभाती थी और अपने पास बुलाती थी। गोलबाज़ार में 'मौसाजी' का दही-खटाई वाला समोसा और 'नीलकमल' की रसमलाई का स्वाद आज भी लोगों की जुबान में तर-ओ-ताज़ा है. छितानी मितानी धर्मशाला गली में 'राजहंस' का तीखा सेव-चना, कल्लू उस्ताद की  आलू की भजिया तथा कड़ी‌-मीठी चाय और प्रकाश होटल के खाने का स्वाद न जाने कहाँ खो गया. गोलबाज़ार में एक और उल्लेखनीय दुकान थी, अली हुसैन की जहाँ का कीमा समोसा, पाया रोटी, कवाब और बिरयानी खाने वाले शौकीन ग्राहक कुछ ज़ाहिर तो कुछ छुप-छुप कर जाया करते थे. 

एक अप्रैल 1957 से पूरे देश में दाशमिक प्रणाली के सिक्कों का चलन प्रारम्भ हो गया। एक पैसा, दो, पांच, दस,पच्चीस, पचास और सौ पैसे याने एक रूपया के सिक्के जब बाजार में आए तो उसकी खूबसूरती देखते ही बनती थी। चमचमाते सिक्कों की खूबसूरत डिजाइन और उनका हल्कापन बेहद मनमोहक था। ये सिक्के बाजार में आ गए लेकिन जनसामान्य को दाशमिक प्रणाली समझ में नहीं आ रही थी। मसलन, इकन्नी बराबर छः नए पैसे, चवन्नी बराबर पच्चीस नए पैसे, अठन्नी बराबर पचास नए पैसे आदि में परिवर्तित करके लोग लेन देन किया करते थे। यही हाल दाशमिक प्रणाली के नाप का हुआ। सन 1958 में छटांक, सेर और मन के बदले दस, बीस, पचास, सौ, दो सौ, पांच सौ ग्राम तथा एक, दो, पांच, दस, बीस, पचास और एक सौ किलो याने एक क्विंटल के बाँट- सामान तौलने के लिए आ गए। तरल पदार्थ मापने के लिए दस मिलीलीटर से एक लीटर तक के अल्युमिनियम के जार आ गए। कपड़ा और जमीन के नाप के लिए प्रचलित इंच, फुट और गज के स्थान पर मीटर के नाप आ गए। यह दाशमिक प्रणाली वैज्ञानिक एवं सरल थी परन्तु इस परिवर्तन को लोग स्वीकार नहीं कर पा रहे थे, लोग कहते- ‘कहाँ से नई झंझट आ गई।'
ध्यान देने योग्य बात यह है कि सन 1958 में दाशमिक प्रणाली  प्रारंभ की गयी और आज तक हम मनुष्य का कद फुट और इंच में, जमीन के भाव फुट के हिसाब से और मकान की लम्बाई चैड़ाई तथा उंचाई फुट में ही बोलते-बताते हैं।

बिलासपुर की ये बातें पुरानी हैं. बस्ती यद्यपि बदल रही थी लेकिन घर, बाजार और लोगों के पहरावे में पुरानापन कायम था. घरों की डिजाइन राजमिस्त्री तय करते थे या घर मालिक स्वयंं. घर के बीचो-बीच एक आंगन, आगे-पीछे और सामने कमरे. किचन तय नहीं होता था कि कहां होगा, सामान्यतया आंगन में ही एक कमरा निकल जाता था जिसमें रसोई बनती थी. रसोई के लिए मिट्टी के दो चूल्हे, एक सिगड़ी, एक जालीदार आलमारी की व्यवस्था हो गई, उतना ही पर्याप्त था. संडास और स्नान के लिए छोटा सा कमरा अलग-अलग घर के एकदम पीछे बनवाया जाता था. बड़े घरों में आंगन में कुंआ खोदवाया जाता था, शेष के घरों में हाथ से टेड़ कर पानी निकालने वाला नल. सरकारी नल अस्तित्व में नहीं थे. घर की डिजाइन बनाने वाले आर्किटेक्ट के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं थी. 
दुकानें आधी पक्की और आधी कच्ची हुआ करती थी. शो-केस का चलन नहीं था, शटर नहीं थे, लकड़ी के दरवाजे या फट्टे लगाकर दुकानें बंद की जाती थी. 
सामान्यतया पुरुष धोती और कुरता या लंबी कमीज पहनते थे, स्त्रियां साड़ी और पोलका पहना करती थी, बच्चे हाफ पैंट या चड्डी पहनते थे. 

सन 1961 के बाद का समय 'तेजी से बदलाव' का समय था. सड़कों पर डामर बिछने लगी. अश्व-चालित तांगों की बराबरी करने के लिए मनुष्य-चालित रिक्शे आ गए. शहर में उन दिनों मुश्किल से पंद्रह-बीस कारें रही होंगी, ‘शेवर्ले' जैसी बड़ी और ‘आस्टिन' जैसी छोटी कारें सड़कों पर इठलाती घूमती थी। ए.जे.एस., जावा और बुलेट मोटरसायकल जब धक-धक की आवाज करती बीच सड़क में निकलती तो सबकी निगाहें उसी ओर घूम जाती। लोगों में रॉयल इन्फील्ड की ‘बुलेट' का गजब क्रेज था जिसे केवल शौकीन धनिक ही खरीद पाते थे, शेष बेचारे कसमसा कर रह जाते। सन 1950 में भारत सरकार ने इटली की दो कंपनियों को भारत में सीमित मात्रा में स्कूटर बनाने का लायसेंस दिया। सबसे पहले ‘लेम्ब्रेटा' नाम की नई नवेली दुल्हन जैसी बाइक बाजार में आई। कम कीमत, कम आवाज और ढंकी-छुपी लेम्ब्रेटा को देख कर सबके दिल उसे हासिल करने के लिए कसमसाने लगे। कुछ वर्षों बाद आयी ‘वेस्पा', जिसने देश भर में धूम मचा दी। वेस्पा गाढ़े आसमानी और हल्के सुआपंखी रंग में आती थी जिसकी याद आज भी मनमस्तिष्क पर अंकित है। ‘घर में कुछ हो न हो पर स्कूटर अपने पास होना'- के जुनून ने मध्यमवर्गीय परिवारों की बढ़ती क्रयशक्ति का एकतरफा दोहन किया और सम्पूर्ण भारत की सड़कें इन आकर्षक स्कूटरों से सज गयी। बिलासपुर वाले स्कूटर खरीदने के लिए रायपुर और भिलाई जाया करते थे, यहाँ स्कूटर और मोटरसायकिल और कार की कोई एजेंसी नहीं थी.  
बिलासपुर इतना छोटा शहर था कि यहाँ एक भी दैनिक अखबार नहीं छपता था, रायपुर में प्रकाशित अखबारों के भरोसे लोग काम चलाया करते थे. कुछ साप्ताहिक प्रकाशित हुआ करते थे जैसे, 'तूफान', 'नया तूफान', बूंद और मोती', 'लोकमित्र' 'पराक्रम' आदि. 

उस युग में रेडियो सुनने का शौक और खरीदने की ललक बढ़ने लगी, कपूरचंद एंड संस के यहां फिलिप्स रेडियो, सलूजा रेडियो के यहां मर्फी रेडियो और प्रधान साउंड तथा हरीश सराफ के यहां बुश रेडियो धड़ल्ले से बिकने लगे. यद्यपि उनकी कीमत अधिक थी इस कारण उसे खरीदना सबके वश की बात नहीं थी फिर भी घर में रेडियो होना चाहिए, यह मानसिकता सभी की थी. कुछ समय बाद रेकार्ड प्लेयर का युग आया, तब पहले आगे-पीछे दो गाने वाले रेकार्ड आए, उसके बाद चार गाने वाले ई-पी रेकार्ड और उसके बाद दस-बारह गाने वाले एल-पी रेकार्ड आने लगे. पूरा बिलासपुर संगीतमय हो गया. 

शहर में कुल मिला कर चार सिनेमा हाल थे- श्याम टाकीज, मनोहर टाकीज, लक्षमी टाकीज और प्रताप टाकीज। इनमें अनेक फिल्में लगी, चली और उतरी। 'फर्स्ट शो' का मतलब शाम को साढ़े छः बजे और 'सेकण्ड शो' याने रात को साढ़े नौ बजे का प्रदर्शन हुआ करता था। सन 1955 के आसपास दोपहर को 'मेटिनी शो' शुरू किये गए जिसमें पुरानी फिल्में दिखाई जाती थी। रविवार को सुबह 'मार्निंग शो' होते थे जिसमें अंग्रेजी, बाँग्ला या तेलुगु फिल्में दिखाई जाती थी।
एक से एक फिल्में, नाचता झूमता संगीत, आंसुओं के सैलाब, हंसी के ठहाके, रोमांस की गुदगुदी, दोस्ती-यारी, टिकट खरीदने की भीड़-भड़क्का, गरमागरम मूंगफल्ली, दो आने में चालू फिल्म के गाने की किताब, बदबू से भरा पेशाबघर, सीट में छुपे रक्तचूसक खटमलों का उत्पात, चलती फिल्म में अनायास विद्युत्प्रवाह भंग हो जाने पर उठता शोर और गालियों का दौर तथा असंख्य लोगों की अनगिनत यादें इन टाकीजों से जुड़ी हुई हैं। 
1970 के दशक में एक नई टाकीज का उद्घाटन हुआ, जिसे बिलासपुर के शराब ठेकेदार बिहारीलाल जायसवाल ने बनवाया. इस टाकीज में पहली फिल्म लगी, 'बलराम श्रीकृष्ण'. उसकी सजावट अनुपम थी, पूरा थियेटर एयर-कूल्ड था, सीटें आरामदेह थी. बिलासपुर शहर की शान था यह नया थियेटर बिहारी चित्र मंदिर. 

गोलबाजार की तरह सदरबाजार बर्तन, आभूषण और कपड़े की दूकानों का केंद्र बन गया। धीरे-धीरे हर गली-मोहल्ले में दूकानें खुलने लगी और आज पूरा शहर विभिन्न वस्तुओं की दूकानों से पट गया है। बाजार बदल गए हैं, बाजार में मिलने वाली वस्तुएँ भी बदल गई हैं। पहले दूकानों में गरम दूध बिकता था अब आइसक्रीम पार्लर खुल गए, परचून की दूकानें थी अब माल खुल गए, आयुर्वेदिक दवाओं की दो-एक दूकानें थी अब एलोपेथिक दवाओं की असंख्य मेडिकल स्टोर खुल गए। दो अस्पताल थे अब पचास हो गए, दस-पाँच डाक्टर थे अब सैकड़ों हो गए हैंं. अधिकतर लोग मनुष्य थे अब धन-उत्पादक-यंत्र हो गए।

बिलासपुर में 'होशियारी' नामक एक किला है जिसमें केवल यहाँ के राजनीतिज्ञ निवास करते हैं। इस किले की होशियारी का इतिहास अक्षुण्ण है जो आजादी के बाद से अब तक कायम है। सबसे पहले सांसद बने अमरसिंह सहगल, उसके बाद 'ये' और 'वो' भी। इन सबके दर्शन कभी किसी को नहीं मिले, सबके सब मिट्टी के माधव थे, किसी काम के नहीं निकले। पैंसठ साल की स्वर्णिम कालावधि को उन सबने मिलकर मिट्टी में मिला दिया। यही हाल विधायकों का भी था। बिलासपुर के जितने विधायक बने, संयोग से सब मंत्री बने लेकिन सबको अपनी और अपने परिवार के उत्कर्ष की चिंता थी, शहर भी ऐसा गज़ब का है जो उन्हीं के विकास के लिए चिंतित रहता है ! ऐसा शहर कहीं और भी है क्या ? आप सोचिए कि कितना गजब हुआ, इस शहर से छः लोग राज्य के स्वास्थ्यमंत्री बने और ये निर्लज्ज बिलासपुर में एक मेडिकल कालेज न खुलवा पाए। आज़ादी के पहले नगरपालिका के एक अध्यक्ष थे कुंजबिहारीलाल अग्निहोत्री जिन्होंने गोलबाज़ार बनवाया था, उनके बाद बने अध्यक्षों और महापौरों के कार्यकलाप यहाँ लिखने लायक नहीं है, वैसे, मौखिक बताने लायक बहुत कुछ है।

सागर की तरह शांत और सीमाबद्ध रहने वाले इस शहर में मतवैभिन्य के बावजूद बिलासपुरिया होने का भाव सदैव ऊपर रहा। आत्मीयता की उष्णता, सरोकार की भावना और सद्भाव की महक ने सबको एक दूसरे से इस कदर जोड़ कर रखा कि यहाँ जो भी आया, यहीं का बनकर रह गया।

बिलासपुर ऐसा शहर है जो हमेशा अंगड़ाई लेने की मुद्रा में रहता है, जैसे अभी-अभी जागा हो और उसकी नींद पूरी न हुई हो। जिन पर शहर को संवारने का गुरुतर भार सौंपा जाता है वे नगर विकास की समुचित योजना और सक्षम कार्य संस्कृति के अभाव में कुछ खास नहीं कर पाते और खिसियानी हंसी का भाव अपने चेहरे पर चिपकाए हुए अपने चम्मचों की वाहवाही के इर्दगिर्द छुपे रहते हैं. बिलासपुर की आबादी बढ़ी, लोगों की आवाजाही बढ़ी, यातायात बढ़ा, व्यापार बढ़ा, साथ ही अव्यवस्था बढ़ी, अपराध बढ़ा. किसी समय में बिलासपुर की गिनती छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक शान्त शहर के रूप में होती थी, लोग सेवानिवृत्ति के बाद यहाँ आकर बसना पसंद करते थे लेकिन अब हमारा शहर भी असुरक्षित सा होने लग गया है.

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-द्वारिकाप्रसाद अग्रवाल
चलभाष : 9893123663
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                    

5 Comments:

At 9 August 2016 at 20:17 , Blogger sameer_archy said...

ज़बरदस्त लिखा है आपने. ये अधकचरा कल्चर सभी पुराने शहरों की आत्मा को मार रहा है

 
At 28 April 2018 at 00:41 , Blogger Dwarika Prasad Agrawal said...

आभार आपका

 
At 30 April 2019 at 22:22 , Blogger Unknown said...

अद्भुत लेखन शत शत नमन आदरणीय पिता तुल्य द्वारिका प्रसाद जी अग्रवाल

 
At 30 April 2019 at 22:31 , Anonymous Anonymous said...

बहूत ही भावपूर्ण अवलोकन,

 
At 1 May 2019 at 09:39 , Blogger Unknown said...

बहूत सटीक एवं दिल को छू लेनेवाला विवरण

 

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