यही है हमारा बिलासपुर
जहां लोग बसते हैं, वहाँ बस्तियाँ बस जाती हैं। आम तौर पर बस्तियाँ वहाँ रूप लेती हैं जहां पानी उपलब्ध होता है। खोड्री के पहाड़ से निकली एक बरसाती नदी अरपा अपने आसपास मनुष्यों की आबादी को निमंत्रित करती हुई बहती रही और उसके पावन जल के आसरे लोग सदियों से जीते आ रहे हैं। उद्गम से लगभग 80 किलोमीटर दूर अरपा नदी का पाट बहुत चौड़ा हो जाता है, वहां उसके दोनों छोर पर लोग अपने घर बनाकर बस गए जिसे अब सब बिलासपुर कहते हैं।
कहते हैं, बिलासा नाम की मछुआरिन के नाम पर इस बस्ती का नामकरण हुआ। यह बात दिल को खुशी देता है कि एक स्त्री को शहर के नामकरण का सौभाग्य मिला। अरपा नदी के किनारे बसी यह छोटी सी बस्ती दिनों-दिन पसरती जा रही है, किसी दानव की मानिंद अपने अगल-बगल की उपजाऊ जमीन को लीलते हुए क्रांकीट के मकानों की शक्ल ले रही है। धान की उपज देने वाले खेत अब धन उगल रहे हैं। बिलासपुर में वे लोग अब नहीं रहते जो रहते थे, होते थे; अब इस शहर में ऐसे लोग रहते हैं जो न होने के बराबर हैं। हर इन्सान अकेला रहता है, अपने घर में भी अकेला रहता है। पहले ऐसा न था, सब एक साथ रहते थे, पूरी बस्ती किसी अविभाजित संयुक्त परिवार की तरह एक-दूसरे से हिल-मिल कर रहती थी।
छत्तीसगढ़ी भाषा में 'जूना' का अर्थ है, पुराना। जानकार लोगों का अनुमान है कि सबसे पुरानी बस्ती अरपा नदी के किनारे पचरीघाट के आसपास बसी होगी जिसका विस्तृत क्षेत्र जूनाबिलासपुर कहलाता है। यहाँ सभी जाति और व्यवसाय के लोग रहते हैं, पुरानी शैली के घर हैं, पतली गलियां हैं और पुराना रहन-सहन भी। किसी जमाने में यहाँ घरेलू वस्तुओं के कुटीर उद्योग थे। आवागमन के साधन नहीं थे इस कारण सब लोग स्थानीय उत्पादन पर आश्रित थे। कोष्टापारा में कपड़े बुने जाते थे, कुम्हारपारा में मिट्टी के बर्तन बनते थे। तेलीपारा में घानी की मदद से तेल निकाला जाता था, काछीपारा में सब्जी उगाई जाती थी। पारा का अर्थ है मोहल्ला जो बांग्ला भाषा के 'पाड़ा' से प्रभावित लगता है। घसियापारा, डबरीपारा, जबड़ापारा, चाटापारा, मगरपारा, इमलीपारा, तालापारा, लोधीपारा, ईरानीपारा, केवटपारा, नाऊपारा, गोंडपारा, बंगालीपारा, बरछापारा, कतियापारा, ब्राह्मणपारा, टिकरापारा, तारबाहर, शनीचरी पड़ाव आदि पुराने मोहल्लों के नाम वहाँ के व्यापार, रोजगार या समूह के आधार पर रखे गए समझ आते हैं। तोरवा, कर्बला, सरकंडा, चाटीडीह, दयालबंद, मसानगंज, खपरगंज, जूनीलाईन, कुदूदंड, जरहाभाटा आदि अनेक प्राचीन मोहल्ले हैं लेकिन इनके नाम के गुणसूत्र का पता नहीं है, ये मोहल्ले अब भी बड़ी शान से कायम हैं।
बिलासपुर सन 1861 के पूर्व छत्तीसगढ़ आठ तहसीलों और जमींदारियों के रूप में रायपुर से प्रशासित होता था। सन 1861 में किये गए प्रशासनिक परिवर्तन के फलस्वरूप बिलासपुर को एक नए जिले का रूप दिया गया। वर्तमान सिटी कोतवाली में बंदोबस्त अधिकारी का कार्यालय बनाया गया। गोलबाजार उस समय जिला कचहरी था। कंपनी गार्डन उन दिनों ईस्ट इण्डिया कंपनी की गारद (परेड) के लिए उपयोग में लाया जाता था। सन 1919 में मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार के फलस्वरूप एक नया प्रदेश अस्तित्व में आया जिसे सेन्ट्रल प्रोविंस का नाम दिया गया। इसमें वर्तमान महाराष्ट्र के चार जिले, महाकोशल के अठारह जिले और साथ में छत्तीसगढ़ को भी जोड़ा गया।
एक समय का गाँव बिलासपुर, अंग्रेजों के शासन काल में जिला बनने के बाद कस्बा बना फिर अर्धनगर, उसके बाद नगर और अब अर्ध-महानगर बन गया है। यहाँ तक की यात्रा लगभग डेढ़ सौ वर्ष में पूरी हुई। इस नगर की धरती को असंख्य लोगों ने अपने परिश्रम से सींचकर हरा-भरा किया, इसमें संस्कार के धागे बुने। बहुत से अनाम हैं जिन्हें कोई नहीं जानता लेकिन कुछ नामचीन भी हैं जिन्हें भारतवर्ष जानता है जैसे रंगकर्मी पंडित सत्यदेव दुबे, नाट्यलेखन के सशक्त हस्ताक्षर डॉ.शंकर शेष और साहित्यकार श्रीकांत वर्मा जैसी मशहूर हस्तियाँ, इसी बिलासपुर की माटी की देन हैं। इसी शहर में जन्मे हाकी खिलाड़ी लेस्ली क्लाडियस भारतीय हाकी टीम में लंदन ओलिम्पिक (1948 : स्वर्ण पदक), हेलसिंकी ओलिंपिक (1952 : स्वर्ण पदक), मेलबर्न ओलिम्पिक (1956 : स्वर्ण पदक), रोम ओलिम्पिक (1960 : कप्तान : रजत पदक) खेलों में एक खिलाड़ी के रूप में शामिल रहे. इन्हें सन 1971 में पद्मश्री सम्मान प्राप्त हुआ। एक और, काशीराम रजक अखिल भारतीय स्तर के हाकी खिलाड़ी रहे हैं जिनका तोक्यो ओलिम्पिक (1964) की टीम में चयन हो चुका था लेकिन खेल-राजनीति के चलते उनका नाम हटा दिया गया.
अंग्रेजों ने बंबई से कलकत्ता तक रेल्वे की लंबी लाइन बिछाई, बिलासपुर बीच में आ गया। सन 1889 में यहाँ रेल्वे स्टेशन बनाया गया। स्टेशन के आसपास का बहुत बड़ा भूखंड रेल्वे को आबंटित किया गया जिसे 'रेल्वे कालोनी' कहा जाने लगा। यहाँ दूर तक जाती रेल की पांतों के अलावा रेल कर्मियों के लिए आवासीय घर, खेल के मैदान और क्लब बने। शुरुआत में रेलकर्मियों के रूप में लाल रंग के चेहरे लिए कुछ अंग्रेज़ आए जो लाल रंग के वृहदाकार 'बंगले' में रहते थे। दूर-सुदूर बंगाल, आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, उत्तरप्रदेश आदि राज्यों के भारतीय रेल्वे की नौकरी में यहाँ आए जो मध्यम और छोटे घरों में व्यवस्थित किए गए। इनकी दैनिक जरूरतों की आपूर्ति के लिए बुधवारी बाज़ार बनाया गया जहां अनाज, किराना, कपड़ा, सब्जी आदि उपलब्ध थे। रेल्वेकर्मियों के इस समूह ने बिलासपुर को गाँव से शहर में तब्दील करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बिलासपुर के देहातीपन को इन प्रवासियों ने बदल दिया और यह बस्ती शहर बनाने की राह पर चल पड़ी।
जगदीशनारायण की दूकान 'पेंड्रावाला' में सभी वस्तुएँ देशी घी से बनाई जाती थी, मिठाई, नमकीन और पूरी- सब्जी। पूरी-सब्जी की लोकप्रियता का आलम ऐसा था कि बिलासपुर के आसपास सौ-पचास मील दूर बैठे किसी व्यक्ति को अगर पूरी-सब्जी की याद आ गई तो वह अगले दिन बिलासपुर जाने के लिए कोई न कोई बहाना अवश्य खोजता, जैसे, कचहरी में पेशी है, कलेक्टर आफिस जाना है, आर॰टी॰ओ॰ का काम है, डाक्टर को दिखाना है, खरीदी करना है, बैंक में काम है आदि कुछ भी काम 'खोजा' जाएगा और उसे बिलासपुर जाने वाली अगली ट्रेन या बस में बैठकर रवाना होना ही है। बिलासपुर पहुँच कर खोजा गया काम बाद में होगा, पहले 'पेंड्रावाला' में पूरी-सब्जी का आस्वादन होगा क्योंकि घर से निकल-भागने का असली मकसद पहले पूरा होना चाहिए। इसी दुकान में शहर की पहली आइसक्रीम की मशीन लगाई गयी थी जिसने नगरवासियों को 'साफ्टी' आइसक्रीम से परिचित करवाया.
एक से एक फिल्में, नाचता झूमता संगीत, आंसुओं के सैलाब, हंसी के ठहाके, रोमांस की गुदगुदी, दोस्ती-यारी, टिकट खरीदने की भीड़-भड़क्का, गरमागरम मूंगफल्ली, दो आने में चालू फिल्म के गाने की किताब, बदबू से भरा पेशाबघर, सीट में छुपे रक्तचूसक खटमलों का उत्पात, चलती फिल्म में अनायास विद्युत्प्रवाह भंग हो जाने पर उठता शोर और गालियों का दौर तथा असंख्य लोगों की अनगिनत यादें इन टाकीजों से जुड़ी हुई हैं।
सागर की तरह शांत और सीमाबद्ध रहने वाले इस शहर में मतवैभिन्य के बावजूद बिलासपुरिया होने का भाव सदैव ऊपर रहा। आत्मीयता की उष्णता, सरोकार की भावना और सद्भाव की महक ने सबको एक दूसरे से इस कदर जोड़ कर रखा कि यहाँ जो भी आया, यहीं का बनकर रह गया।

5 Comments:
ज़बरदस्त लिखा है आपने. ये अधकचरा कल्चर सभी पुराने शहरों की आत्मा को मार रहा है
आभार आपका
अद्भुत लेखन शत शत नमन आदरणीय पिता तुल्य द्वारिका प्रसाद जी अग्रवाल
बहूत ही भावपूर्ण अवलोकन,
बहूत सटीक एवं दिल को छू लेनेवाला विवरण
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