17 July 2016

बीके सर


हम उन्हें 'बीके सर' कहते थे। 'थे' इसलिए क्योंकि वे हमें छोड़ कर चले गए लेकिन वे अभी हैं, हमारे दिलों में हैं। पूरा नाम बृजेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, मूल निवासी- कानपुर, शिक्षा- इलाहाबाद, नौकरी- बिलासपुर। सन १९६२ में वे बिलासपुर के सीएमडी कालेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक बन कर आए और लगभग ५५ वर्ष तक यहां रहे फ़िर अपने पुत्र के साथ रहने के लिए मुम्बई चले गए. १९६३ से ६५ तक मैंने अपने ‘ग्रेजुएशन’ के दौरान उनसे अंग्रेजी पढ़ी और उनसे बहुत दुखी रहा करता था क्योंकि वे अंग्रेजी को अंग्रेजी भाषा में पढ़ाते थे. वे जो कुछ पढ़ाते-समझाते थे वह मेरे पल्ले नहीं पड़ता था क्योंकि अपनी अंग्रेजी बेहद बर्बाद थी. मेरे जैसे बुद्धूओं से दुखी होकर उन्होंने अंग्रेजी विभाग छोड़ दिया और राजनीति विज्ञान पढ़ाने लगे।

सर से मैंने केवल अंग्रेजी ही नहीं पढ़ी, जीवन की इबारत भी उनके सौजन्य से समझी। वे अद्भुत मार्गदर्शक थे और हितवा भी। अपने हर दुख-सुख में मैंने उनको अपने पास खड़े हुए पाया। ऐसा केवल मैं नहीं था, बिलासपुर के बहुत से ज्ञानी-ध्यानी उनके ज्ञान-सानिध्य का लाभ लेते थे। 

बिलासपुर में बहुत से कालेज थे, उनमें पढ़ाने वाले अनेकों विद्वान थे। कुछ पढ़ाकर सेवानिवृत्त हो गए, कुछ शहर छोडकर चले गए, कुछ दिवंगत हो गए लेकिन उनमें इक्का-दुक्का होंगे जो अपनी विद्वता से ऊपर उठकर सरल हृदय मनुष्य के रूप में प्रस्तुत हुए होंगे, बीके सर उनमें से एक थे।

बीके सर को बिलासपुर बिलकुल नापसंद था लेकिन बिलासपुरिया लोग बहुत पसंद थे। कानपुर और इलाहाबाद जैसे शहरों में अपने जीवन के 25 वर्ष बिताने के बाद किसी को भी बिलासपुर जैसी छोटी बस्ती पसंद आने से रही लेकिन बिलासपुर उन बस्तियों में से है जो किसी को भी अपने आँचल में इस तरह समेटती है कि जो यहाँ आया, वह यहीं का बन कर रह गया।

संभवतः सन 1961-62 में वे सीएमडी कालेज में प्राध्यापिकी करने बुलाए गए, अंग्रेजी पढ़ाने के लिए, नायर साहब जैसे सज्जन व्यक्ति उनके एचओडी थे, अच्छे लोगों का समूह था कालेज में, सो यही रम गए। यही पर वे रमन भाभी को दिल्ली से ब्याह कर लाए। यहीं उनके दो बच्चे जन्मे, नन्हू और गुड़िया। यहीं उन्होंने थीसिस लिखी और डाक्ट्रेट हासिल की लेकिन वे कभी भी अपने नाम की शुरुआत में डाक्टर नहीं लिखते थे। मैंने उनसे पूछा- 'आप हमेशा प्रो॰ बी के श्रीवास्तव लिखते हैं, डा॰ बी के श्रीवास्तव क्यों नहीं?'
'मैंने डाक्ट्रेट की है, यह सच है। मैं पीएचडी हूँ लेकिन अपने नाम के आगे मुझे डाक्टर लिखना नापसंद है। बेशक, लोग मुझे डाक्टर कहें, मुझे मंजूर है। यह मूर्खता है, जैसे किसी को 'पद्मश्री' मिली हो और वह व्यक्ति अपने नाम के आगे 'पद्मश्री' शब्द का उपयोग करे।' उन्होंने कहा। 

आम तौर पर वे मितभाषी व्यक्ति माने जाते थे लेकिन जिनसे उनका दिल मिला हुआ था उनसे भरपूर बातें करते थे। उनके शुरुआती मित्र थे, दो सगे भाई, इंदर और राम बाबू सोंथलिया। सदर बाजार के इन्द्र प्राविजन स्टोर में उनकी हर रोज की शाम गुजरती और बिलासपुर के बुद्धिजीवियों से उनकी मुलाक़ात होती, विचार-विमर्श होता। 

बीके सर नाप-तौलकर बात करने के अभ्यस्त थे। उत्तरप्रदेश की पैदाइश और परवरिश होने के बावजूद अपशब्दों का प्रयोग उन्होंने कभी नहीं किया। वे जिस विषय पर बोलते, अधिकार के साथ बोलते और जिस विषय के बारे में वे अधिकार से नहीं बोल सकते थे उस बात पर वे मुस्कुरा कर चुप हो जाते। खास तौर राजनीति पर वे इतनी सटीक टिप्पणी करते कि उस समय उनकी बात समझ में भले न आए लेकिन बाद में उनकी की गई भविष्यवाणी सही उतरती। बिलासपुर के बहुत से विद्वान वक्ता उनके पास अपना भाषण तैयार करवाने आया करते थे। 

बीके सर मेरे मार्गदर्शक थे, हितवा थे, मितवा थे। उनका होना मेरे लिए जितना मायने रखता था, न होना भी उतना ही मायने रखता है। पैंतालीस वर्षों तक मेरा उनका प्रायः रोज का साथ था जिसमें अधिकतर विचार-विमर्श होता, जग की बातें होती, शतरंज की बाज़ी होती और साथ में गरम-गरम चाय। दशहरा-दीवाली-होली में बीके सर के घर गए बिना हमारा त्यौहार सजता नहीं था। रमन भाभी का स्नेह और बीके सर का आशीष मेरे लिए जीने के जुगत जैसा था। 

मैंने उन्हें कालेज में पढ़ाते और छात्रसंघ के चुनाव का निष्पक्ष संचालन करते देखा, शिक्षकों के हित के लिए लड़ते देखा, लोगों से खुली और साफ बात करते हुए देखा, गंभीर विषयों पर तार्किक भाषण देते सुना, बदलते मौसम के अनुरूप कपड़े बदल कर पहनते हुए देखा, अभाव और आर्थिक परेशानियों से जूझते हुए देखा, वृध्द माँ की सेवा-सुश्रूषा करते हुए देखा, बड़ी बहनों की फिक्र करते हुए देखा, गुड़िया बिटिया के असमय निधन पर मर्मांतक विचलित होते हुए देखा, पुत्र प्रशांत के भविष्य के लिए चिंतित और उसकी उपलब्धियों पर मुस्कुराते हुए देखा और मधुमेह की बेहूदा बीमारी से लंबे समय तक मुक़ाबला करते हुए देखा। 

मैंने उनको कभी भी किसी की खुशामद करते या लल्लो-चप्पो करते नहीं देखा। मेरा अनुमान है कि जो लोग उन्हें पसंद करते थे, वे उन्हें बहुत अधिक पसंद करते थे और जो उन्हें नापसंद करते थे वे उनसे बहुत चिढ़ते थे। चिढ़ने वालों का चिढ़ना वाजिब था क्योंकि वे किसी से दबने वाले इंसान नहीं थे। वे संकोची थे लेकिन एक सीमा तक। 

उनसे मिलना एक समग्र मनुष्य से मिलने जैसा होता था। उनका न होना आज अविश्वसनीय सा लगता है। वे जब बिलासपुर छोडकर मुंबई जाने लगे, मैंने उन्हें बहुत रोका, समझाया लेकिन बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण वे अपने पुत्र प्रशांत और पुत्रवधु सरिता की देखरेख में चले गए और वहीं से चुपचाप इतनी दूर चले गए कि अब हमसे कभी न मिल सकेंगे। इस जीवन में बीके सर से मिलना मेरे जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। अगले जन्म में फिर मिलेंगे, सर। 

'गुज़रा कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गई,
एक शख्स सारे शहर को वीरान कर गया।' 




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