24 September 2018

न्याय का मनमंदिर

अदालत जारी है। बार रूम में व्यस्त वकीलों की आवा-जाही चल रही है। आज जिनके केस नहीं लगे हैं, वे भी आए हुए हैं और गप-शप में लगे हुए है। इनके अलावा कुछ नवागंतुक वकील भी झक्क सफ़ेद मक्खनजीन का फुलपेंट, टेरीन की सफ़ेद शर्ट, काला कोट और कालर में 'बो' लटकाए चुपचाप बैठे हुए हैं। इन्तजार है कि कोई मुवक्किल उन्हें भी वकील समझे और अपनी परेशानी बताकर कानूनी मदद मांगे लेकिन लोग देखते तो है, पर रुकते नहीं। ऐसे दो वकील दुखी मन से बात कर रहे हैं, "बंधु, क्या इन्हें अपने वो दिन याद नहीं आते जब इस 'फील्ड' में वे नए थे?" एक ने दूसरे दुखी से पूछा।
"याद तो होगा लेकिन पैसे कमाने की हवस में हम लोगों का हक इन लोगों की समझ के बाहर हो गया है।" दूसरे ने उत्तर दिया।
"यहाँ अपने पैर जमाने के लिए हम क्या करें? कब तक बार रूम में बेकार बैठे रहेंगे?"
"यार, कभी ये भी बेकार थे।"
"उन दिनों इतने वकील न थे, 'कांपिटीशन' न था।"
"कोई उपाय ?" भास्कर ने पूछा।
"हाँ  है, मेरे दिमाग में एक बात है। क्यों न हम कलेक्टर से मिलें? 'पापर केस' वे हमें दे सकते हैं।" विनय ने सुझाया।
"गुड आइडिया।" भास्कर ने कहा।

थोड़ी देर में युवा वकीलों का एक दल कलेक्टरेट पहुंचा। कलेक्टर ने उनकी बात गौर से सुनी लेकिन उन्हें संदेह था कि गरीबों को न्याय दिलाने के लिए नियुक्त किए गए वकीलों के रूप में यदि नए लोगों को लिया गया तो क्या वे न्याय दिलाने में समर्थ हो सकेंगे? अनुभवहीनता कहीं बाधक तो नहीं बनेगी?
"अनुभव के लिए ही आपसे अवसर देने की प्रार्थना कर रहे हैं।" भास्कर ने कहा।
''ये सच है कि काम करने से ही अनुभव मिलेगा लेकिन यह भी संभव है कि आपकी अनुभवहीनता से कोई निर्दोष सज़ा पा जाए?'' कलेक्टर ने प्रश्न किया।
"आप ठीक कहते हैं सर लेकिन आपको हमारी योग्यता पर अविश्वास क्यों है? हमें भी इस 'फील्ड' में अपने पैर जमाने हैं, अपनी योग्यता सिद्ध करनी है। किसी सीनियर से अधिक मेहनत करने का उत्साह हम में है। सच तो यह है कि आप ये केस जिन सीनियरों को देते हैं, वे आधे-अधूरे मन से काम करते हैं क्योंकि फीस कम मिलती है। एक मर्डर केस का आप मुश्किल से तीन सौ रुपए देते हैं जबकि उनकी सामान्य फीस तीन हजार के करीब है, वे क्यों ध्यान देंगे? उनकी लापरवाही के कारण भी मुलजिम को निर्दोष होने पर भी सज़ा मिल सकती है लेकिन आपको यह भ्रम है कि आपने केस किसी नामी वकील को दिया है।" भास्कर ने समझाया।
"नहीं, मैं नहीं मानता कि ऐसा होता होगा।"
"चलिए आपकी बात मान लेते हैं, आप सही हैं लेकिन मरीज मर सकता है के डर से क्या नए डाक्टर को सर्जरी नहीं करने देंगे?" विनय ने कहा।
कलेक्टर कुछ देर के लिए चुप हो गए। इस दलील ने उन्हें मुद्दे को गहराई तक समझने के लिए प्रेरित किया। चुप्पी तोड़ते हुए उन्होने कहा, "ठीक है, सामान्य अपराध के मामले आप लोगों को देकर देखेंगे।"
''इसका मतलब यह हुआ कि आपको हम पर पूरा भरोसा नहीं है?''
"नहीं, ऐसी बात नहीं है। अभी आपने कहा कि अनुभव के लिए हमें मौके चाहिए।"
"छोटे-मोटे केस तो हमें मिल जाते हैं, हम किसी बड़े केस में अपनी बानगी दिखाना चाहते हैं।"
"ठीक है, एक मर्डर केस की एप्लिकेशन पेंडिंग है मेरे पास, अभी देता हूँ, आपमें से कौन करेगा?'
"मैं तैयार हूँ सर।" विनय ने तुरंत चुनौती स्वीकार की।
"यदि मुलजिम को सजा हो गयी तो आप अपनी हार मानेंगे ?"
"तो आप किसी अपराधी विशेष को सजा से बचाना चाहते हैं क्या?" विनय ने पूछा। सब लोग एक साथ हंस पड़े।

वकालत के क्षेत्र में सात महीने चप्पल घिसने के बाद विनय का आत्मविश्वास टूटने लगा था। अदालत में  दलालों का ज़ोर है। मुवक्किल किसी वकील के पास पहुँचने के पहले ही किसी न किसी दलाल का मुर्गा बन जाता है। दलाल उसे अच्छा वकील करवा देने का भरोसा देकर उसे ऐसे वकील के सुपुर्द कर देता है जो उसे फीस का आधा या आधे से अधिक हिस्सा दे दे। बिलासपुर के बाररूम की छप्पर की छांह में अपने बाल सफ़ेद कर चुके टाइपिस्ट एक अर्जी टाइप करते हुए विनय को समझाया, "शुरू में तो दलालों की मदद लेनी पड़ेगी वकील साहब, जब वकालत चलने लगेगी तब भले ही इनको दुत्कार कर भगा देना।"

विनय के समक्ष समस्या यह थी कि वह अपने परिश्रम की आय का का बड़ा हिस्सा दलालों को देने के लिए तैयार नहीं था। पूरा केस पढ़ना, दरख्वास्त बनाना, अदालत में हाजिर होना और जिरह करना; ये सब उसे करना है जबकि दलाल कुछ नहीं करेगा, मुवक्किल को सिर्फ लेकर आएगा और मुझसे पैसा झटक कर ले जाएगा ! वकालत छोड़ कर दलाली का धंधा कर लेना चाहिए, रंग लगे न फिटकरी, रंग चोखा। इस बीच दो मामले हाथ आए भी तो उसके बदले 'सलाम वकील साहब' ही हाथ आया। पूरा दिन सीनियर वकीलों की ऊल-जलूल चर्चा सुनने में बीतता। काम सीखने के लिए एक सीनियर की शरण में गया तो कुछ नहीं सिखाया, अपना मुंशी बना लिया और कहा, "काम करते रहो, देखते रहो, धीरे-धीरे सब समझ में आ जाएगा।"
खाली जेब लिए घर में घुसने पर अपराधबोध होता, पाँच महीने बीत गए लेकिन पाँच रुपए नहीं कमाए, यह कैसी वकालत? कलेक्टर की चुनौती ने उसके मन में नई उमंग भर दी, संभावनाओं के द्वार खोल दिए। आज सरकार से मिली नियुक्ति की पहली पेशी थी। उसका मन उस सैनिक की तरह पुलकित था जिसे लंबे अभ्यास के बाद मोर्चे पर लड़ने के लिए भेजा जा रहा हो। 

सुबह आठ बजे विनय जेल पहुंचा जहां मुवक्किल से उसकी मुलाक़ात तय थी। मुवक्किल को देखकर वह चौंक गाय। 65 वर्ष के बिसाहूराम पर अपनी बहू के साथ बलात्कार करने के बाद उसकी हत्या का आरोप था। उसके काले बदन पर एक बंडी थी, घुटनों तक पट्टु, सिर में बंधा हूर नीले रंग का मैला गमछा, सिर और दाढ़ी में छोटे-छोटे पके बाल, कीचड़ से मिचमिचाती आँखें और नंगे पैर। सहज और निर्विकार दिखने वाले ग्रामीण पर दो गंभीरतम अपराध। मेरे दिमाग में पुलिस में दर्ज़ एफ॰आई॰ आर॰ के गैर-सिलसिलेवार बयानों का घटनाक्रम घूम गया : 

'मेरा नाम चंद्रिकाप्रसाद अवस्थी है। मैं अपने गाँव का सरपंच हूँ। मृतक हीरामनीबाई को मैं जानता था। वो सुकालू की घरवाली थी। अरथी उठाने के पहले मैं मृतक के गले में नीले निशान देखा था इसलिए पुलिस में रिपोर्ट लिखवाया है। हीरामनी बाई पिछले तीन दिन से लापता थी। सुकालू मेरे पास आया था। हम सबने उसे खोजने की बहुत कोशिश की थी। आज सबेरे खबर मिली कि हीरामनीबाई की लाश उसके घर के कुआं में तैर रही है। मेरे सामने लाश को निकाला गया।
बिसाहूराम को मैं तीस-पैंतीस साल से जानता हूँ। हीरामनीबाई उसकी बहू है, सुकालू की घरवाली है। बिसाहू की घरवाली ने मुझे बताया था कि उसके घरवाले ने अपनी बहू के साथ गलत व्यवहार करता है, उसकी नज़र खराब है। मैंने बिसाहू को समझाया तो उसने साफ इंकार कर दिया था और बोला था कि खबर सरासर झूठ है।
मुझे लगता है कि जिस दिन बिसाहूराम और उसकी बहू घर में थे, उस समय कोई दूसरा नहीं था, बिसाहू राम ने उसके साथ गलत काम किया होगा और मामला छुपाने के लिए उसका गला घोंटकर लाश को कुआं में फेंक दिया।'

'मेरा नाम सुकालूराम है, बिसाहूराम मेरा बाप है। हीरामनीबाई मेरी ब्याहता घरवाली है। मेरी उम्र तेईस साल है और हीरामनीबाई सत्रह साल की रही होगी। मेरे कोई भाई-बहन नहीं हैं। घर में हम चार लोग रहते हैं। एक बरस पहले मैं घरवाली का गौना कराकर अपने घर लेकर आया था। हमारी कोई संतान नहीं है। मेरी माँ ने दो महीने पहले बताया था कि बाप की नज़र में खोट है लेकिन मुझे माँ की बात पर भरोसा नहीं हुआ। मैंने हीरामनी से इस बारे में पूछा था लेकिन उसने मुझे कुछ नहीं बताया। हीरामनी जिस दिन से लापता है, उसी दिन मेरी माँ नहा-धो कर चौपाल में गयी थी जहां से गाँव की बारह औरतों और चार आदमियों का गोल (झुंड) गंगा नहाने के लिए बिलासपुर होते हुए इलाहाबाद जा रहा था। सबेरे के टाइम मेरे बाप ने मुझसे माँ को स्टेशन तक छोड़ने के लिए कहा। मैं भी गाँव वालों के साथ पैदल स्टेशन तक गया। गाड़ी छूटने के बाद पैदल वापस आया। उस समय सूरज डूबने वाला था। घर में हीरामनी नहीं थी। मेरा बाप घर में था। मैंने उससे हीरामनी के बारे में पूछा तो उसने बताया कि बहुत देर से घर में नहीं है, किसी के घर बैठने गयी होगी। जब बहुत देर तक वह घर नहीं लौटी तो मुझे फिकर हुई, मैं मोहल्ले में खोजने गया, वह कहीं नहीं मिली। अगले दिन अपनी ससुराल जाकर पता किया तो वह वहाँ भी नहीं थी। मैं घर वापस आ गया। मैं बड़ी फिकर में था और मेरा बाप भी परेशान दिख रहा था।
तीसरे दिन सबेरे के टाइम जब मैंने कुआं से पानी निकालने के लिए रस्सी से बाल्टी डाली तो पानी के साथ हीरामनी की साड़ी भी बाल्टी में फंस कर आ गयी। मैं उसकी साड़ी को पहचानता था। साड़ी नीले रंग की थी। कुआं में झांक कर देखा तो हीरामनी की लाश तैर रही थी। हल्ला मचने पर गाँव के लोग इकट्ठा हो गए। लोगों की मदद से लाश को बाहर निकाला गया। सबने सोचा कि हीरामनी पानी भरते समय कुआं में फिसल कर गिर गयी होगी।
मिट्टी के लिए ले जाने के पहले जब लाश को नहला रहे थे तब सरपंच ने हीरामनी के गले में नीला निशान देखा। सरपंच को समझ में आया कि जरूर किसी ने उसका गला घोंट कर हत्या की है इसलिए उसने पुलिस थाना में जाकर रिपोर्ट लिखवाया। पुलिस ने लाश को डाक्टरी मुलाहिजा करवाने ले गयी।
जिस दिन मैं अपनी माँ को स्टेशन पहुँचने गया था उस दिन मेरा बाप और हीरामनी घर में थे। मेरी माँ ने जो बताया था, उसके हिसाब से ऐसा लगता है कि हो सकता है कि मेरे बाप ने ऐसा किया होगा।'

'मैं रामप्रताप सिंह, थाना प्रभारी कोरबा थाना, आज दिनांक 26.02.1968 को मौका वारदात पर गया। हीरामनी की लाश गाँव वालों ने पहचानी है। लाश को कुआं से निकाला गया है। लाश के ऊपर साड़ी पड़ी है। साड़ी गाढ़े नीले रंग की है, किनारी में देहाती जारी का काम किया हुआ है। बदन में लाल रंग का ब्लाउज है, गले में काले रंग का धागा है और पैरों में चाँदी की पायल पहने है। मृतका के गले में नीला निशान है जिससे तसदीक होती है कि किसी ने उसका गला घोंट कर उसे मारा है। उसके बदन पर और कोई हथियार के वार या चोट के निशान नहीं है। लाश का पंचनामा करके डाक्टरी मुलाहिजा के लिए जिला अस्पताल सुपुर्द किया है।
गाँव का सरपंच चंद्रिका प्रसाद अवस्थी और मृतक के पति सुकालू के बयान के बिना पर संदेह बनता है कि हीरामनी की हत्या उसके ससुर बिसाहूराम ने की हो सकती है इसलिए बिसाहूराम को दफा 302 (भा॰द॰सं॰) के तहत गिरफ्तार किया जाता है।'

विनय ने बिसाहूराम से पूछा, '' सच सच बताओ, क्या हुआ था?"
"वकील साहब, मैं बेकसूर हूँ। सरपंच मुझसे चिढ़ता है इसलिए मेरा नाम लेकर फंसवा दिया। मेरी उम्र है क्या ये सब गलत काम करने की?' बिसाहू ने कहा और आँखों का कीचड़ अपने गमछे से साफ करने लगा। 'पता नहीं, किस पापी ने मेरी बहू को मार डाला?" वह सुबकने लगा।
"आज तुमको अदालत में पेश करेंगे। सच्ची बात जज साहब को बताना। सब ठीक हो जाएगा।" विनय ने समझाया। बिसाहू हाथ जोड़े खड़ा रहा।

मुकदमा शुरू हुआ, चला। चार्ज फ्रेम हुआ, गवाहियां हुई, तर्क-वितर्क हुए। यद्यपि सभी गवाह बिसाहूराम के खिलाफ थे, यहाँ तक कि उसकी पत्नी और बेटा लेकिन परिस्थितिजन्य साक्ष्य मजबूत नहीं थे। किसी ने बलात्कार के समय चीखने की आवाज नहीं सुनी थी। किसी ने हत्या होते देखा नहीं था इसलिए अदालत ने बिसाहूराम को संदेह लाभ देकर बरी कर दिया। अदालत के आदेश पर पुलिस ने बिसाहू की हथकड़ियाँ खोल दी। कटघरे से बाहर निकलकर वह विनय के पास आया और हाथ जोड़कर बोला, "आपने मुझे बचा लिया वकील साहब, नहीं तो मैं फांसी चढ़ जाता साहब।"
"चलो ठीक हुआ तुम बच गये। गाँव वालों से बनाकर रखा करो, बेमतलब फंस गये थे तुम इस मुसीबत में।" विनय ने समझाया।
"नहीं साहब, वो बात नहीं है। मुझसे सच में गलती हो गयी थी।"
"क्या मतलब?''
"मैं ही दोषी हूँ साहब, मुझसे ही वह पाप हुआ था।" बिसाहूराम ने अपनी गलती स्वीकार की।

विनय भौचक्का खड़ा रह गया। उसे लगा, जैसे पूरी अदालत सूनी हो गयी है। कोई नहीं है वहाँ, हीरामनी के सिवाय। वह एक कोने में दुबकी बैठी है, रो रही है। उसने विनय से कुछ कहा। विनय आगे बढ़ा, उसने अपनी जेब से तीन सौ के नोट निकाल कर कहा, "मुझे ये पैसा मिला है, तुम्हें बचाने के लिए नहीं, तुम्हारे ससुर को बचाने के लिए मिला है, समझी?"
विजय ने देखा कि हीरामनी के शरीर से बह रहा खून अदालत की फर्श पर फैलते जा रहा है। वह पथराई आँखों से विनय को देख रही है और जैसे उससे पूछ रही है, "क्या यही न्याय है?"

विनय के साथी वकील उससे पूछ रहे थे, "ये क्या हो गया विनय तुमको। तुम रो क्यों रहे हो? यार, जश्न मनाओ, तुम मुकदमा जीत चुके हो।"

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