देखो वो चला गया :
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अपनी पूरी ज़िन्दगी मैंने दोस्तों की छांह में गुजारी। बचपन में खेल-खेल में दोस्ती बनी, जरा बड़े हुए, वे सब छिटक गए। स्कूल में बनी, जरा बड़े हुए, वे भी छिटक गए। युवावस्था में दोस्ती बनी, जरा लंबी चली, फिर वे लोग भी दूर होते गए। दोस्ती करने का यह जज़्बा कायम रहा, आज भी दोस्त बन रहे हैं। फेसबुक के कारण इसका फ़लक और बड़ा हो गया। पहले कोई मिलता था तो दोस्ती होती थी, अब बिना मिले दोस्ती हो रही है। दोस्ती की इस निर्बाध यात्रा में लोग लगातार जुड़ते जा रहे हैं, कुछ रास्ते में बिछुड़ भी जाते हैं। कुछ से कुट्टी हो जाती है, कुछ भौगोलिक दूरी के कारण दूर हो जाते हैं, कुछ गलतफहमी के शिकार होकर दोस्ती तोड़ देते हैं, कुछ 'अधिक' पैसा या पद कमा लेते हैं तो 'रिजर्व' हो जाते हैं, कुछ सदा के लिए हमारा साथ छोड़ कर बहुत दूर चले जाते हैं जिनसे अब कभी मिलना न होगा। मैं अभी हूँ लेकिन मेरे बहुत से दोस्त मुझे छोड़ कर जा रहे हैं। जाने वाला हर दोस्त मेरे कलेजे का एक टुकड़ा लेकर अपने साथ लेकर चला जाता है, मेरा कलेजा घटता जा रहा है, सिकुड़ता जा रहा है। 8 सितंबर 2018 को मेरा एक और जिगरी दोस्त चन्द्रशेखर जालान (कोलकाता)मुझे छोड़ कर हमेशा के लिए चला गया।
सन 1981 में मेरी उससे मुलाक़ात हुई थी। चन्द्रशेखर जालान बिलासपुर शहर में एक स्टील फेक्ट्री के जनरल मैनेजर बन कर बिलासपुर आए थे, 'हाई-प्रोफाइल पर्सनैलिटी' थी उनकी। शहर के जाने-माने लोग उनको देखकर अदब से खड़े हो जाते थे। पता नहीं कैसे, मुझ हलवाई से उनका नेह जुड़ गया, जो आजीवन कायम रहा। दोस्ती किसे कहते हैं, दोस्ती कैसे की जाती है, दोस्ती कैसे निभाई जाती है; यह मैंने चंदू जालान से सीखा। बिलासपुर में वे चार-पाँच ही रहे होंगे, उसके बाद दिल्ली चले गए, फिर थाइलेंड चले गए और विगत दस वर्षों से वे कोलकाता में रहने लगे। किसी भी घाटे में चल रहे या बंद पड़े बड़े संयंत्र को पुनर्जीवित करने में चन्द्रशेखर जालान को महारत हासिल थी, पूरी दुनियाँ के उद्योगपति उन्हें सलाह-मशविरे के लिए अपने यहाँ बुलाते थे और साथ में काम करने का प्रस्ताव देते थे।
दोस्ती निभाने का जो हुनर मैंने उनके पास देखा, वैसे इंसान मेरी ज़िन्दगी में कम ही आए। मेरी पत्नी माधुरी जी को अपनी बहन बनाया क्योंकि उनकी कोई सगी बहन न थी। हमारी बड़ी बेटी संगीता के विवाह में सम्मिलित होने के लिए वे थाईलैंड से इंदौर तक आए और हमारी खुशी में शरीक हुए।
मेरे बुरे दिन बहुत लंबे खिंचे। उन दिनों के विवरण आत्मकथा में मैंने लिखे हैं। एक प्रकरण, वहीं से निकाल कर प्रस्तुत कर रहा हूँ, आप पढ़िए :
"28 जुलाई 1984 को संयुक्त राज्य अमेरिका के लास एंजिलिस में ओलिम्पिक खेल आरंभ हुए और उसी दिन से बिलासपुर में दूरदर्शन का 'रिले सेंटर' भी। बहुत दिनों से मैं 'हलवाई' की प्रतिष्ठा से मुक्ति लिए छटपटा रहा था। उन्हीं दिनों मेरा ध्यान टेलीविजन विक्रय की संभावना पर गया और मैंने उसी दूकान में बाजार से चार 'ब्लेक-एंड-व्हाईट' टीवी मंगवा कर रख लिए, दूकान चालू हो गई। इस प्रकार मैं एक नए व्यापार में प्रविष्ट हो गया, 'पेंड्रावाला' के एक तिहाई हिस्से में एक नया 'शोरूम' बन गया 'मधु छाया केंद्र'। शमशाद बेग़म का एक गीत आपको याद होगा- 'बड़ी मुश्किल से दिल की बेक़रारी को क़रार आया।'
एक शाम मेरे मित्र चन्द्रशेखर जालान दूकान आए और मुझसे पूछा- 'क्या हाल है ?'
'ठीक है।' मैंने बताया।
'क्या ठीक है ?'
'क्या मतलब ?'
'रिले सेंटर शुरू हो गया है, ये चार टीवी सजाकर क्या धंधा करेगा ?'
'यार, अपने पास पूँजी है नहीं, तकलीफ़ चल रही है, बस ऐसे ही चलेगा।'
कुछ देर वे यूँ ही हंसी-मज़ाक़ करते रहे, फिर चले गए। अगले दिन दोपहर को लगभग एक बजे वे अपनी पत्नी सरिता के साथ कार में आए। मैं अपनी दूकान में बैठा था। मुझसे बोले- 'चल, मेरे साथ चल।'
'कहाँ जाना है ?' मैंने पूछा।
'सवाल बहुत करता है तू, तेरे से एक काम है।'
'मेरा कोई 'रिलीवर' नहीं है, कैसे जाऊं ?'
'किसी 'स्टाफ' को बिठा दे, कौवे।' 'कौवे' शब्द का वही अर्थ था जो आप जानते हैं- काले रंग का चालाक पक्षी।
उन्होंने जिद पकड़ ली, मुझे वैसा ही करना पड़ा। मैं भी उनके साथ कार में बैठ गया। कार 'सिंडिकेट बैंक' में रुकी, हम तीनों अन्दर गए। शाखा प्रबंधक, जालान को आते देख खड़े हो गए, हम सबको आदरपूर्वक बैठाया और पूछा- 'जालान साहब, आपने कैसे तकलीफ़ की?'
चन्द्रशेखर जालान बिलासपुर के उद्योग 'एम.पी.अलॉय' के जनरल मैनेजर थे, उसी बैंक से उनका कारोबार था, पूरे शहर में उनकी बहुत प्रतिष्ठा थी।
'ये साढ़े पाँच लाख की एफ.डी.और एन.एस.सी. हैं, इसे अपने पास रख लीजिए, ये मेरे मित्र हैं इन्हें 'ओवर ड्राफ्ट एडवांस' कर दीजिए।' जालान ने मेरी और संकेत करते हुए कहा।
'आपको कितना चाहिए ?' प्रबंधक ने मुझसे पूछा।
'एक लाख में हो जाएगा।'
'बस, एक लाख, क्या करेंगे ?'
'टीवी और उससे सम्बन्धित सामान लेना है।'
'ठीक है, आप 'पार्टी' का नाम बताइये, मैं आपको एक लाख का 'ड्राफ्ट' बनवाकर देता हूँ।'
'आपकी 'फार्मेलिटी' ?'
'वह सब बाद में हो जाएगा, पहले आप खरीदी कर लीजिए। जालान जी, ये 'पेपर्स' आप रख लीजिए, इसकी ज़रुरत नहीं है, आपने कह दिया, उतना ही काफी है।' शाखा प्रबंधक राजा नरसैय्या ने कहा।
कहते हैं, 'जिसका कोई न हो, उसका खुदा होता है', आप बताइये, चंद्रशेखर जालान जैसा मित्र क्या ख़ुदा से कम होता है?"
देखो.....वो चला गया।
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