कहानी की कहानी
कहानी की शुरुआत कहने-सुनने से हुई थी, फिर लिखने-पढ़ने से आगे बढ़ी और अब वापस कहने-सुनने की ओर बढ़ रही है. लेखक का लिखा हुआ पढ़ने में और उसका लिखा हुआ सुनने में अंतर होता है. लेखक जब कहानी सुनाता है तो लेखन के साथ उसकी भावाभिव्यक्ति भी जुड़ जाती है. इस वज़ह से पढ़ने की बजाय सुनना अधिक सार्थक लगता है. कथावाचन और श्रवण में एक असुविधा भी उपस्थित होती है कि लेखक का कहानी सुनाने का मन हो या न हो, श्रोता के पास सुनने का समय हो या न हो, दोनो कहानी कहने और सुनने के लिए विवश रहते हैं जबकि लेखन और पठन में यह समस्या नहीं रहती.
किसी जमाने में पत्र लेखन का रिवाज़ था, बहुत से लोग उन पत्रो को लिखते-लिखते लेखक बन जाया करते थे, अब वह रोचक विधा गुम हो गई. अखबारो में सम्पादक के नाम पत्र प्रकाशित हुआ करते थे, अब वे भी दिखाई नही पड़ते. इस बीच ब्लागर आ गया, फेसबुक आ गया तो लेखको को लिख्ने का नया मंच मिल गया. पत्र-पत्रिकाओ के सम्पादक की भूमिका कमजोर पड़ गई. अब लेखक और पाठक दोनों सम्पादक बन गए. खुला खेल फरुक्खाबादी. लेख, कहानियां और कविता लिखने वालो के मज़े हो गए. अच्छे रचनाकार उभर कर सामने आ गए, कमजोर पीछे हो गए. अब पुस्तके छपे, अखबारो में लेख छपे, पत्रिकाओ में कहानी या कविता छपे तब लेखक कहलाएंगे, यह बाध्यता समाप्त हो गई. एक प्रकार से हमारे सामने खुला आसमान है, आसमान का निमंत्रण है, जितनी शक्ति है ऊपर जाने की, आओ.
किशोरावस्था में हर छात्र अपने मनपसंद विषय पर कुछ-न-कुछ लिखने की कोशिश करता है. अक्सर ये कोशिशे शुरुआत में ही भसक जाती हैं, व्यवधान हो जाता है. युवा हो जाने के बाद फिर से कोशिश की जाती है, अब कुछ-कुछ समझ में आने लगता है. नए लेखक के सामने पहली समस्या आती है कि किस विषय पर लिखूं. लिखने के पहले खूब पढ़ना पड़ता है, आसपास की दुनिया को गौर से देखना पड़ता है, उन पर मनन करना होता है, फिर लिखने की हिम्मत जुटानी पड़ती है, फिर दृष्टा के रूप में तटस्थ होकर लिखना पड़ता है, तब कहीं जाकर साहित्य लेखन होता है. तेज गति से जाने वाले वाहन में सवार होकर अगल-बगल नही देखा जा सकता, पैदल चलने से ही आस-पास दिखाई देता है. इस आसपास होने वाली हर घटना के पीछे कोई-न कोई कहानी होती है. हर एक व्यक्ति की कोई-न कोई कहानी होती है. उसे गौर से देखना, समझना और फिर उसे शब्द देना ही कहानी लिखना होता है.
अंत में, हमने एक कहानी पढ़ी, पढ़ने के बाद हम जैसे थे, वैसे ही रह गए तो समझ लो, कहानी निरर्थक थी, बेकार थी.

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