28 August 2024

मेरी कविता

(1)

'तू क्यों चली गई ?

खिलखिलाता बचपन
मुस्कुराती चितवन
तोड़ नेह का बंधन
तू क्यों चली गई ?'

आँगन की छम-छम
चौके की सिहरन
पूरे घर की धड़कन
तू क्यों चली गई ?'

मेज पर करती पढ़ाई
घर में सबसे लड़ाई
लेकर सबकी बड़ाई
तू क्यों चली गई ?'

सहमी सी मेज
सिसकती कुर्सी
सुबकती किताबें
तू क्यों चली गई ?'

कोने से घूरती
धूल भरी सायकल
भौंचक मोपेड
तू क्यों चली गई ?'

पुरानी चप्पलें
तह लगे कपड़े
चुप आलमारियाँ
तू क्यों चली गई ?'

वो उछलकूद
वो गहमागहमी
वो रूठना मनाना
तू क्यों चली गई ?'

हर बात पे गुस्सा
हर बात से आहत
हर बात की चिन्ता
तू क्यों चली गई ?'

बहना से भिड़ंत
लड़ाई-झगड़े अनंत
इस तरह करके अंत
तू क्यों चली गई ?'

ढूंढती सुबह
बेचैन दोपहर
सवालिया शाम
तू क्यों चली गई ?'

खिड़कियाँ सिसकती
दरवाजे चिहुंकते
परदे फड़कते
तू क्यों चली गई ?'

दरकते फर्श
सूनी दीवारें
उदास गलियारे
तू क्यों चली गई ?'

बेचैन हवाएँ
वीरान सा घर
सिसकता आँगन
तू क्यों चली गई ?'

मुरझाई पत्तियाँ
उदास कलियाँ
हैरान अमियाँ
तू क्यों चली गई ?'

बग़ीचे में बढ़ी तुलसी
मोंगरे की सुगंध सी
फागुन की बयार सी
तू क्यों चली गई ?'

पापा के सखा
मम्मी की सखियाँ
सबकी भीगी अँखियाँ
तू क्यों चली गई ?'

तेरा आना पुरवाई जैसा
तेरा रहना शहनाई जैसा
तेरा जाना रुसवाई जैसा
तू क्यों चली गई ?'

अपने भाई को देख
सूनी कलाई को देख
उसकी रुलाई को देख
तू क्यों चली गई ?'

क्या बस इतना ही साथ
स्वप्न सा छोटा सा साथ
इससे तो न होता साथ
तू क्यों चली गई ?'

अब क्या रह गया इस घर में
मम्मी-पापा के जीवन में
सब कुछ सूना एक पल में
तू क्यों चली गई ?'


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(2) 12.05.2019

झूठ का सच
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'ऐसी भी क्या नासमझी
कि सच में छुपा झूठ न समझ आए
या झूठ का झूठ पकड़ में न आए
इतना मंदबुद्धि तो न था मैं, 
लेकिन अब न जाने क्या हो गया है
सच के झूठ और झूठ के झूठ
दोनों में मुझे सच नज़र आता है
आखिर झूठ भी तो एक सच्चाई है।'

Translation in English by Surendranath Kapoor :

What is this confusion,
that, can't detect lie in ostensive truth'?

Was never so dumb witted,
that can't distinguish between truth and lie!

After all,lie is also a Truth! 

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(3) 27.5.2019


तब मैं बच्चे से बड़ा हो रहा था
कलम को स्याही में डुबा कर लिखा करता था
कागज़ पर लिखे शब्द चमकते थे
शब्द उलटकर मित्रपृष्ठ से चिपट जाते थे।

एक दिन की बात है,
गीले शब्दों को सुखाने के लिए
मैंने स्याहीसोख उठाया
शब्द चीखे,
'अपने लिखे को निस्तेज कर रहे हो?
समझते हो कुछ?
मेरी चमक खो जाएगी,
मेरा वजन कम हो जाएगा
शब्द हल्के हो जाएंगे तो उनका असर कम हो जाएगा
और
ये जब तुम
बेरहमी से मुझे स्याहीसोख से दबाते हो
मेरी साँसें थमने लगती है,
दम घुटने लगता है,
दर्द तो वही जानता है न
जो दर्द सहता है। 
अभी मुझ पर रहम करो
मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो
मुझे कागज पर चमकने दो।

मेरी नमी में अभी ठंडक है
मौसम को बदलने दो,
ये शब्द हौले-हौले गर्म होंगे
फिर आग बनकर धधकेंगे
और,
जब ये झूठ और मक्कारी को
जलाकर खाक कर देंगे,
तब स्याहीसोख को
अपने जेब से निकाल कर
इन लपटों के हवाले करना
फिर दहकते अंगारों में से
एक चुटकी राख निकालना 
उससे अपने ललाट पर तिलक करना
फिर मुस्कुराना 
तब चैन की सांस लेना
तब तक सब्र करो, मेरे लेखक।



Translation in English by Surendranath Kapoor :

'Then I was growing from child to boy!

Would write by dipping pen into ink!
Words written on paper would shine!
Wet ink would cling to the page,
In turn ,words would do likewise!

One day,
I picked up blotting paper to dry up, wet words!

Words shrieked!

You are taking shine away from your words!

Do you understand?
I would loose my brightness and weight!

When words become lighter,
their efficacy would diminish!

And,when you press me cruelly with blotting paper,
my breath slows down,
I suffocate!

Only sufferer knows the pain!
Have mercy on me,!
leave me to my fate!
let me shine on paper!
My dampness is cool now!

Let weather change,
these words will slowly warm up,
and would emit fire!

And
when they reduce lies and fraud to ashes,
then take out blotting paper from your pocket,
and consign them to flames!
Search for a little ash from scorching fire!
put the ash on your forehead,
smile and be at peace!

Until then,
have patience,
my author!'

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Naresh Saxena  : अरे वाह! शब्दों का चमक कर अंगार बन जाना, और स्याही सोख़्तों की राख का तिलक । बहुत सुंदर। बधाई।

Rajendra Shrivastava शब्दों को इंतज़ार है धधकने का, दहकने का, लावा बन कर बहने का। वर्जनाओं का तिरस्कार कर चमकने का  पर स्याही सोख्ता को भी तो इंतजार है अपने दायित्व के निर्वहन का। बिरले ही हैं आजकल जो अपने कर्तव्य पालन में निष्ठा दिखाते हैं।
शब्दों को ये नही मालूम कि चमक उनकी नही है, चमक उस वाक्य से उजागर होती है जो इन सब शब्दों के विलय से आता है ।


(4)
06.06.2019


"मुझे आदेश हुआ है
'नदी पर कविता लिखो'
जैसा कभी गुरूजी कहते थे 
'गाय पर निबन्ध लिखो।'

घर में एक गाय थी, उसे रोज देखते थे
घर के पास नदी थी, उसे भी देखते थे
गाय नदी जैसी थी, सतत दूध देती थी
नदी गाय जैसी थी, सतत जल देती थी
भरपूर दूध पिया, पेट भर गया,
भरपूर जल पिया, जी भर गया,
अब गाय का दूध सूख चुका है
अब नदी का जल सूख चुका है।

बेशक मैं अपराधी हूँ,
चाहे जो सजा दो
लेकिन मुझसे यह न कहो
कि नदी पर कविता लिखो
या गाय पर निबन्ध लिखो।

अब नहीं लिख सकता मैं
बचपन की बात और थी।"



Translation in English by Surendranath Kapoor :

'I have been told to write a poem on river,

like, I was once instructed by my teacher,
to write an essay on cow! 
There was a cow and a river,
we would watch every day!

Cow was like river, giving milk continuously!
River was like cow, giving water perennially!
Drank milk and water to heart's content, no more!
Now,cows milk and river water, both have dried up!
Of course, I am the culprit, meet out due punishment!
But don't ask me to write essay on cow, or poem on river!
Can't do it now!
Childhood was a different matter!'

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Shashank Tiwari हम तो पुष्ट हो गए गाय व नदी का शोषण कर ।अब जब,कुछ करने की बारी आई तो,हाथ खड़ा कर दिये!!कितना कृतघ्न होता है मानव ।वक्त बीतने के पहले जागना होगा हमें।वरना गाय व नदी जिसे माँ कहा गया है पुराणों में,सिर्फ और सिर्फ किताबों मे मिलेगी ।


Devesh Bajpai अब तो उस गाय और नदी का कर्ज चुकाने का समय है।नही तो आने वाली पीढियाॅ इन्हें सिर्फ फोटो पर देखेगी।

Umakant Pandey वाह.. गजब..अचंभित कर देने वाली रचना..इस वर्ष की सबसे खूबसूरत कविता.. बेहद मर्मस्पर्शी..
Radharaman Tripathi दिल को छू गई,यह छोटी-सी कविता । कितना दर्द छुपा हुआ है,इसमें । संवेदनशील ही समझ सकता है ।

साधना मिश्रा चिंतन पर मजबूर करने वाली रचना । बेशक अब नहीं लिखा जा सकता नदी पर कुछ भी......

Shailesh Kumar Singh सारगर्भित ह्रदयस्पर्शी,
वर्तमान समय की हक़ीक़त बयान करती कविता,
आज दोनों की स्थिति अत्यंत जीर्ण-शीर्ण अवस्था में अपनी गौरवशाली इतिहास को याद करते हुए भविष्य को लेकर द्रवित है एक सच्चा इंसान जो जनहित याचिका भरी अपनी लेखनी से आमजनों को चेता रहा है ॥


Debashish Journalist Good morning, sir.
न चाहते और न कहते हुए भी आपने बहुत कुछ कह दिया। और क्या चाहिए?



Mahadeo Prasad Agarwal जज़्बातों व वास्तविकता को क़लम से कैनवास पर उतार दिया है श्रीमान आपने तो ! 

Jyotsana Awasthi सुप्रभात भैया, थोड़े में बहुत कुछ कह जाना,ये सबके बस में नहीं ।

R.p. Jaiswal कविता द्वारा जिस तरफ ध्यान दिलाना चाहते हैं तो सफल रहे। जिस गौ और गंगा का सच्चाई की कसम खाकर सफाई देते हैं, आज सच पूछो तो उनकी महत्ता उपयोग हमें अच्छी तरह से समझना चाहिए। परंतु उन्हें अपने आश्रित समझकर सदा अनदेखा करते हैं।भूल छोटी सी भी हो,सदा दुखदाई होता है। देखभाल करना सुरक्षित रखना सुखद जीवन के लिए हमारा भी पहला कर्तव्य होना चाहिए।

Basant Sao कविता सोचने पर विवश करती है। देश में गाय और नदी दोनों की स्थिति अच्छी नहीं। जहां नदी सूख गई है वहीं घास के अभाव में गाय प्लास्टिक की थैली और फेका गया दूषित भोजन खाने को मजबूर है।

Chandan Mukherjee ये तो गज़्ज़ब किया आदरणीय आपने। उस बचपन के गाय के निबंध से नदी तक आकर आज के दौर की व्यथा को कितनी सुदरता से सामने रख दिया। बहुत बधाई आपको और मेरी हार्दिक इच्छा है इस दिशा में कुछ और लिखें।

Padmakar Asthana इतने भावुक न बनो, सर जी। आप किसी पर भी, किसी पल भी, कुछ न कुछ अवश्य लिख सकते हैं और वह सदैव सारगर्भित ही होगा क्यों कि जब भी आप की लेखिनी लिखने के लिए तैयार होती है सरस्वती माता तुरंत आपकी लेखनी पर विराजमान हो जाती हैं।

Sadhana Upadhyay Chourey कविता महज़ कविता नहीं है यह सच्चाई के शब्द हैं बहुत बढ़िया..

(5)
13.06.2019

सूर्य तपा,
लो पानी बरसा,
पसीना बहा,
लो ठंड पड़ी,
तब भी
हाय हाय.
शादी नहीं हो रही,
लो शादी हो गयी,
बच्चा नहीं है,
लो बच्चे हो गए,
फिर भी
हाय हाय.
गरीबी है,
लो पैसा आया,
जिन्दा हैं लेकिन
अब मर नहीं रहे,
उसकी भी
हाय हाय.
इस हाय-हाय ने,
धरती पर बिखरती किरणों को न देखा
प्यासे पौधों पर टपकती बूंदों को न देखा
चहुं ओर महकती हरियाली को न देखा
पत्तियों पर थिरकती ओस को न देखा.
अपनी दुनियावी जरूरतों के बहाने
रिश्ते की गर्माहट को नहीं समझा
किसी स्त्री का जीवन भर के लिए
घर में आकर बस जाना नहीं समझा.
बच्चों की मधुर किलकारियों में
संभावना की रुनझुन न सुनी
डगमगाते कदमों से सम्हलने की
उम्मीद भरी चाहत न सुनी.
कुछ पेट की आग बुझाने की दौड़ में
कुछ दौड़े नोटों की गड्डीे की होड़ में
सिक्कों की झंकार की मदहोशी में
भूले धुन मस्तानी जीवन जीने की.
लेकिन अब,
अपने आज को
अपने हासिल को
अपना जीवन समझ
जी भरकर जीना है.
क्योंकि यह पल
हर पल
हमारे साथ चलेगा.

When sun scorched,it rained.
After sweating,it turned cool.
Still kept crying.

Was not getting married,
marriage was solomnized.
Had no child,children were born.
Still,went on crying.

Was suffering poverty,money
started flowing.
Was alive and not dying.
For this also,
Cry,cry,cry.

This crying has not allowed
me to enjoy rays spread on earth,
nor dripping drops on thirsty plants,
fragrant greenery all over and
dancing dew on leaves.

Did not appreciate warmth of
relationships on the pretext of
materialistic needs nor appreciated a
woman's settling down in my home,
life long.

Didn't pay heed to jingling of
possibilities in the melodious laughter
of children.

Some slogged to satisfy hunger,others
chased god of wealth.
Intoxicated by sound of coins forgot
to listen to the tune of joyous life.

But now,I have to enjoy ,to heart's
content,
my possessions considering them
as my life.
Because this moment will be with me
always.
-द्वारिकाप्रसाद अग्रवाल

डॉ.कृपाशंकर पाण्डेय वाह वाह सर..जबरदस्त शुरुआत है पद्य की.

Narayan Suthar कविता पर भी आपकी कलम जोरदार चलती है

Usha Sharma बहुत सुंदर सटीक मार्मिक मर्मस्पर्शी भावपूर्ण अभिव्यक्ति



(6)
03.07.2019 


चुप रहो
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चुप रहने से घुटन हो तो हो
लेकिन टूटन बच जाती है
मुरझाते रिश्ते फिर पनप जाते हैं
इसलिए चुप रहो।
मालूम है?
छुपाना जरूरी है
क्योंकि खुले घाव से बदबू फैलती है
खुला घाव सबको दिखेगा
सब जान जाएंगे
कहेंगे, कुछ करते क्यों नहीं?
घाव अंदर फैलता है तो फैलता रहे
दिखेगा तो कुछ करना होगा
हम कुछ कर नहीं सकते
इसलिए चुप रहो।
याद आयी मुझे अपने दोस्त
लक्ष्मीनारायण के गले की तकलीफ
कुछ खा न सके
कुछ गुटक न सके
साफ बोल न सके
घर में बता न सके
कि कैंसर पनप रहा है।
मिडिल स्कूल का टीचर
चार लड़कियों का बाप
किसी को किस मुंह से बताता
कि कैंसर पनप रहा है?
डाक्टर मंहगा
अस्पताल मंहगा
जांच मंहगी
सर्जरी मंहगी
दवा मंहगी
लेकिन चल रही सांस सस्ती है
या कहें मुफ्त में चल रही है
तो चले, जब तक चले
इन सांसों की गिनती बढ़ाने में
यदि बचत निपट गयी
यदि प्राविडेंट फंड निपट गया
तो चार बेटियां कैसे निपटेंगी?
इसलिए वह चुप रह गया
खुद निपट गया
पर वह चुप रह गया
चुप्पी ने उसे धीरे-धीरे खा लिया
जैसे कैंसर धीरे-धीरे शरीर को खाता है।
चार छोटी-छोटी लड़कियों की डोली
अपने कंधे पर उठाए
वह कैंसर से लड़ता रहा
लेकिन चुप रहा
और एक रात
सदा के लिए चुप हो गया।
नन्हीं बेटियाँ क्या जाने
कि उनकी विदाई के लिए
किसी ने चुपचाप अपने प्राण दे दिए,
अस्पताल क्या जाने कि
लक्ष्मीनारायण कितनी बार
अस्पताल को दूर से निहारता
सदा के लिए सो गया
क्योंकि कैंसर का मुकाबला करने के लिए
उसके पास उसके दोस्त द्वारिका जैसा
पैसे का जुगाड़ नहीं है
जिससे वह बिकाऊ इलाज खरीद ले।
अगर खरीद सकता तो अपने जीते जी
अपनी बेटियों की विदा करता
अपने जिगरी दोस्त की तरह।
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा
बस, चुप रह गया
क्योंकि यह उसका खुद का फैसला था
कि किसी से कुछ मत कहो
चुप रहो।
-द्वारिकाप्रसाद अग्रवाल

English transation by Surendranath Kapoor :

I know it is necessary to hide,
because open wound emits foul smell।
Open woun d be seen by every body,

and they would say,
Why don't you do something?

If wound spreads inside,let it be so!
If it is seen,some treatment would be mandatory,
We are helpless!
So,keep mum!


I recollected the throat pain 
of my friend Laxmi Narayan,
who couldn't eat,swallow or,

speak clearly .

Middle school teacher,father 
of four girls.
How could he tell at home,
cancer was spreading?


 Expensive doctor hospital,investigations,
surgery and medicines,
except breath ,which is

free until it stops!

If,in order to prolong
them, savings and provident
fund are spent,then how four
daughters would be taken
care of?So,he kept mum!

Silence slowly finished 
him,like cancer slowly 
wears down the body!

Carrying palanquin of
four small 
daughters upon his
shoulders,he went on
battling cancer, but
kept quiet and one 
night ,fell silent forever!

Small daughters would
never Know that ,for
their marriage ,someone 
gave his life!
Nor would hospital know,
how many times Laxmi 
Narain ,looked at it from
a distance ,passed away
forever!

Because, like his friend,
Dwarka,he had no source
of money,with which he 
could have bought treatment!

If that were possible,he would,
like his bosom friend, have
bidden goodbye to his daughters!

But,he didn't say anything and 
kept mum ,asit was his 
decision to not tell anybody,
and keep quiet!



अंतर मन को डग मगा गई आपकी बहुत छोटी काव्य रचना ।
@द्वारिका जी,
मुझे मालूम नहीं,आपके शहरमे केंसर का इलाज होता है या नहीं,लेकिन यहां *राजकोट* और *अमदाबाद* दोनों शहर में गरीब परिवार के लोगों के लिए पूरा इंतजाम और इलाज मिलता है । अब तो याहकी(गुजरात) में *मुख्यमंत्री योजना* में एक भी पैसे के खर्च के बिना इलाज मिलता है ।
Anand K Singh सामाजिक सरोकार से पूर्णतः सरोकार रखती मार्मिक कविता। 
यह कविता हज़ारों-हज़ार उच्च शिक्षित मध्यम आयवाले लोगों की हक़ीकत है। आय से अधिक आर्थिक बोझ से संघर्ष करते लक्ष्मीनारायण जैसे लोग अक़्सर चुपचाप निपट लेने में ही अपनी भलाई समझते हैं।
ओह...! बेहद मार्मिक कविता।
Anmol Saxena जिस पर गुजरी वो ही जाने,
कह गये हैं बड़े सयाने ।😢
Pushplata Chaudhary आर्थिक अभाव, मनुष्य को कितना बेबस और आत्मघाती बना देते हैं |
Manoj Kumar Verma आपकी संवेदनशील लेखन ने दिल को भीतर तक झकझोर दिया सर.
Ajay Sinha वाह भइया, आम व्यक्ति को परिभाषित कर दिया आपने । बहुत ख़ूबसूरीति से दर्द, मज़बूरी, लाचारी और बेबसी के तालमेल को बैठाते हुए हर लोगों की पीड़ा ज़ाहिर की , खुद महसूस किए बिना संभव नही । 
Nisha Shukla रो दिए !
Avenindra Mann मार्मिक ,,,,कैंसर की पीड़ा से भी आगे की पीड़ा,
Ram Khilavan Verma चुप रहते हुए भी सब कुछ कह देना कोई आप से सीखे 
Javed Usmani कविता संवाद का सशक्त माध्यम है , बशर्ते रचनाकार आप जैसे लोग हो , कालजयी रचना , बधाई
Arun Maheshwari जिंदगी के कड़वे और क्रूर यथार्थ की मार्मिक अभिव्यक्ति। 
Pramod Asthana ओ हो...... अत्यंत ही मार्मिक व्यथा एक मजबूर पिता की ....
आपने इस व्यथा को इतने मार्मिक शब्दों में व्यक्त किया है कि पढ़कर आँखें नम हो गईं।
Anjana Mishra शब्द नहीं,उस पीड़ा के लिए
शब्द नहीं अभिव्यक्ति के लिये
मेरे भी,एक परिचित है,जो सालों से इस पीड़ा से गुजर रहे हैं।

(7)
12.12.2019

तुम डरो 
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तुम मेरी तरफ हो कि नहीं?
नहीं, तो किसकी तरफ हो?
किसी की तरफ नहीं!
ऐसा क्यों?
क्या तुम्हें मेरी ज़रुरत नहीं? 
क्या तुम्हें अकेले डर नहीं लगता?
नहीं लगता?
तुम कैसे मनुष्य हो जो डरते नहीं?
बिना डरे जीना भी कोई जीना होता है?

मां-बाप-भाइयों से डरो
स्कूल-कालेज के अध्यापकों से डरो 
बदमाश सहपाठियों से डरो 
पति हो, पत्नी से डरो 
पत्नी हो, पति से डरो 
बाप हो, लड़कों से डरो.

अब तो मामला आसान हो गया है 
अब तुम अपने सारे डर मुझे सौंप दो 
कहो, 'तुभ्यं समर्पयामि'
मुझ पर भरोसा रखो
क्योंकि मैं इतना बड़ा डर हूँ कि
मेरे आगे कोई डर ठहरता नहीं है
मेरी शरण में आ जाओ
और तुम चैन की नींद सो जाओ अबोध. 

***Be scared***
Are you on my side?
If not,then on whose side?
Why so?
Don't you need me?
Are you not scared to be alone?
No?
What kind of human are you who is not scared?
It is not being alive without being scared!
Be fearful of mother-father-brothers,
Teachers ,school_college,troublesome class fellows!
If husband,be afraid of wife!
If wife ,be afraid of husband!
If father be afraid of sons!
Now,matter is simple!
Pass on all your fears to me!
Say",it is surrendered to you!
Have faith in me,
because I am such a dreadful fear,
that no fear can stand before me!
Surrender to me,
and now,sleep peacefully ,ignorant!
-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

(8)
01.01.2020

आज़ादी चाहिए
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हथकड़ी दोनों हाथों में थी 
जंजीर दोनों पैरों में थी 
पर ये हमारे दिमाग में कैसे पहुँची?

जेल की ये दीवारें हम से पूछती हैं,
'कैसे मनुष्य हो?
मुझमें और तुम में क्या अंतर रह गया है?
तुम्हारा ह्रदय भी मुझ जैसा हो गया है
पत्थर का?
जिसमें कभी दूसरे की पीड़ा समझने की करुणा थी
जिसमें कभी दूसरे की तकलीफ से सरोकार था
जिसमें कभी दूसरे के विचारों का आदर था
अब वह सब कहाँ खो गया?
मैं और मेरा बच गया
हम और हमारा हमारा खो गया?'

जेल की सलाखें हमसे पूछती हैं,
'तुम्हें रोकने का काम तो हमारा है
लेकिन तुमने
खुद को सीमाबद्ध कर लिया.
खुद को संप्रदायों में बाँध लिया
खुद को जातियों में बाँध लिया
तुम इस धरा में अवतरित हुए थे
मनुष्य के रूप में
हुए थे या नहीं?
फिर ये सलाखें तुम्हें क्यों ललचाती हैं?'

जेल की फर्श पूछती है
'हमारा काम कैदी को
रात में सोने की सुविधा देना है
रात भर वह अपने परिवार से मिलता है
रात भर दोस्तों के साथ हंसी-ठट्ठा करता है
रात भर के लिए मैं उसे आज़ाद करती हूँ
अगली सुबह तक के लिए
और जब वह अगली सुबह जागता है
तो उसे समझ आता है कि
वह फिर से कैदी है.
और तुम
अपने बंधन तोड़ने के लिए तैयार नहीं हो?
कैसे मनुष्य हो तुम
न आज़ाद रहना चाहते हो
न दूसरे को आज़ाद देखना चाहते हो?'

तब मनुष्य ने कहा
'मैं आज़ाद होकर जीना चाहता हूँ 
एक दिन ऐसा आएगा
जरूर आएगा
जिस दिन मेरा मनुष्य जागृत होगा
इसी उम्मीद में अपनी आवाज़
रोज बुलंद करता हूँ
मुझे आज़ादी चाहिए.'
==========
-द्वारिकाप्रसाद अग्रवाल  

Translation by SurendraNath Kapoor
***We want freedom***

We are prisnors not criminals,
yet we are prisoners with handcuffs in both hands and chain in both legs!
What is surprising is, how we realised it?

Walls of prison laugh at us and enquire, "what kind of human beings are you? 
What is the difference between you and me?
Your heart has turned into stone like mine?
It used to once emphathize with pain and difficulties of others and respect their views ! 
Now ,where has all this been lost and it is only me!
'We' has vanished! 
Prison walls say, "it is our task to keepl you in check,
but you have bonded yourself in sects and castes!
You were born as human, isn't it ?
Then why this bondage entices you?

Bars of prision ask,
It is our duty to control you
But you have confined yourself without bars and,

divided yourself in sects and castes!
You were born as human on this earth,
Isn't it?
Then why these bonds and bars entice you!


Floor of jail says,"it is my duty to co-operate in sentencing prisoners 
and providing them facility to sleep at night.
He sleeps with freedom at night,
meets his family
and laughs with his friends in morning! 
Every night, I set him free till morning
and when he awakes in morning, 
he remembers again, 
that he is prisioner from morning till evening! 
But you are bounded by your mind,
unwilling to shed your shackles?
What kind of men are you,
neither willing to remain free nor desirous of seeing others free?

Man replied, "We want to be free and live freely
A day will dawn when our conscience will awake'
I am waiting for that moment everyday 
and with this hope we raise our voice with everybody,
''We want freedom".
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(9)

११.०५.२०२०

भीड़ का हिस्सा
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मैं भीड़ में हूँ
या भीड़ मुझ पर सवार है
मुझे मालूम नहीं
पर मैं भीड़ का हिस्सा जरूर हूँ.

मेरी राय भीड़ तय करती है
मेरी चाल भीड़ तय करती है
मेरा हँसना मेरा रोना
मेरा कहना या चुप रहना
मेरा घर में रहना या बाहर निकलना
भीड़ पर छोड़ रखा है मैंने.

अपना धर्म याद दिलाने का काम
अपनी राजनीतिक समझ का काम
देश के संविधान को मानने का काम
सही गलत में फर्क करने का काम
भीड़ पर छोड़ रखा है मैंने.

भीड़ मेरी मार्गदर्शक है
इसके बल पर मेरा अस्तित्व है
यह बताती है कि मेरा किसमें फायदा है
मैं बेफिक्र होकर चलता हूँ भीड़ के साथ

भीड़ के साथ होने पर
मेरी सोच पर कोई सवाल नहीं उठाता.


मैं मनुष्य नहीं, भीड़ हो गया हूँ

दरअसल मैं कमजोर हो गया हूँ

विरोध करने का साहस नहीं बचा है मुझमें

क्योंकि मुझे जीवित जो रहना है.

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Nawal Sharma मैं भीड़ हूं ।
चेतन आदमी जब ख़ुद मान ले ----
कहां आ पहुंचा मुलुक - सगरे मानुष - सोच लीजिये ।


Vikash Kumar बहुत बेहतरीन कविता आपने लिखी है सर, वर्तमान परिप्रेक्ष्य
में एकदम सटीक बैठती है।


Kapur Chand Gupta 👌🏻💐💐💐💐🙏...
दर असल...
मैं भीड़ में हूं
भीड़ मुझमें है
मैं भीड़ हूं...
अब जब
मैं ये देख
सकता हूं
अग़र तो...
मैं सुविधा
भोगी हूं
जागा हूं
चुनता हूं
अपने सुविधा
अनुसार अपने
होने को...
भीड़ की तरह
या भीड़ में
होने की तरह...
अब मैं भीड़
तो नहीं ही हूं...

Javed Usmani कुरेदता हाल और सवाल , और गहरी कसक व चोट भी

Padmakar Asthana कविता सुंदर है. यह महत्वपूर्ण सवाल उठाती है, क्या हम भीड़ का हिस्सा हैं?

मेरी समझ में आप जैसा बुद्धिमान और स्वतंत्र विचारक साहित्यकार, सामान्य भीड़ का हिस्सा नहीं हो सकता. आपका व्यक्तिगत इतिहास इसका साक्षी है.

Vimal Manikpuri मै लिखना नही जानता ,लिख नही सक रहा हूँ मुझे इतना समझ पाया कि आप ने शानदार कविता के माध्यम से , जबरजस्त उलाहना है व्यंग हैं चिन्ता है

वाकई हम भीड़ के हिस्से होकर रह गए है ।
किसी के शब्द है-----कभी तो उगेगा मेरे सपनों का सूरज ,जिन्दगी अँधेरा नही ,उजालो से भरा होगा ।

Ashwani Kumar भीड़ तंत्र कहना अधिक सही रहेगा क्यों कि भीड़ ही भारत भाग्य विधाता बन गया है । आपने इस भीड़ तंत्र की कोई शिकायत न कर और चुपचाप इसे लिखित में स्वीकार कर इसके ऊपर सबसे सशक्त प्रहार कर दिया है । बधाइयां ।

Anshu Rekha ये तो आज के जागृत हर युवा का सच है..जो किसी को दिखता ही नहीं..

Prahlad Tanwani मैं यानि एक सैनिक, भीड़ यानि सेना. जहाँ चाहे मुझे हाँक लो. कट्टर राष्ट्रवाद ही तो अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति भंग करते आया है, जी हाँ सदियों से..

Riyaz Ahmed यथार्थ को आईना दिखाती बेहतरीन रचना..

Kedar Dubey वाह बहुत खूब आदरणीय। भीड़ की थ्योरी पर एक अनूठी रचना


(10)

10.06.2020


मैं नंगा हो गया हूँ
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मैंने सबके सामने खुद को खोल कर रख दिया है
लोग देखें समझें
और मेरी नासमझियों पर हंसें।

ये नासमझियां मेरी नादानी नहीं थी,
मेरी समझ थी उस समय की
जो समय बीतने के बाद 
मेरी नासमझी समझ में आई

मैं क्या करूँ?
रुत बदल गयी
शुभ्र आकाश में सहसा काले घने बादल छा गये
बादलों की गर्जना ने मुझे हतप्रभ कर दिया
उम्मीद न थी कि काला रंग इतना काला होगा
मैं उदास सा अपने अतीत को झांकता हूँ
झील से झांकते खुले आकाश को झांकता हूँ
मुझे अब भी खुला आकाश अपनी ओर खींचता है
मेरी समझ का वह आकाश
वही मेरी समझ में सही था
वही मेरी जिंदगी का फलसफा था।
काले बादल छा गये हैं
छा जाने दो
कभी न कभी ये बरसेंगे
फिर उगेगा
वही खुला आकाश
मेरी समझ का आकाश
जो मेरे नंगे होने का सबब बना।

-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल



(11)
07.07.2020

अपना घर, आखिर अपना होता है
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मेरे पैरों के घाव अब सूख गये हैं

शरीर की थकान दूर हो गयी है
पेट की भूख भी शांत हो गयी है
अब मुझे अतीत का व्यतीत याद आ रहा है
आज अपनी झोपड़ी में बैठे हुए
ऊपर से बरसते पानी को देख कर
वे आंसू याद आ रहे हैं
जो मैंने उस महानगर में बहाए थे।

मेरा काम छिन चुका था
राशन खत्म हो चुका था
और कितने दिन मांग कर
असहाय हो हाथ फैला कर
आधा पेट खाना खा कर
जीवित रहने का ढोंग कर
जीवन को खींच सकता था।
अपनी भूख तो पानी पीकर मिटा लेता था
बच्चों की लाचारी देखी नहीं जाती थी
पत्नी की बेबसी देखी नहीं जाती थी
तय किया अपने गाँव चलो
अपने घर की छाँव में चलो
किसी तरह यहाँ से तो चलो

पर जाने से पहले
घर का किराया देना जरूरी था
कहाँ से देता
मजूरी छिन चुकी थी
मकानमालिक ने घर का सारा सामान जब्त कर लिया
उसने घर से निकलने के लिए मजबूर कर दिया
अपने गांव वापस लौटने के लिए मजबूर कर दिया।
चल पड़े हम पैदल अपने घर की ओर
सिर पर लादे कुछ कपड़ों की गठरी
छोटे-छोटे बच्चों को गोद में लिए
नौ सौ बीस किलोमीटर की दूरी नापने
चल पड़े हम पैदल अपने घर की ओर

महानगर की सीमा पर तैनात
खाकी वर्दी वालों ने हमें घेरा
हमसे पूछा, 'कहाँ जा रहे हो?'
हमने कहा, 'अपने घर जा रहे हैं साहब'
उसने कहा, 'नहीं जा सकते'
हमने पूछा, 'क्यों नहीं जा सकते?'
उसने सड़ाक से लगाई बेंत मेरे पिछवाड़े
और कहा, 'सवाल करता है बे
हमसे सवाल करता है?
हम वही करते हैं जो सरकार कहती है
हम वही कहते हैं जो सरकार कहती है
सरकारी आदेश है कि कहीं नहीं जाना है
जहां से आए हो, वापस लौट जाओ'
हम घिघियाये,
'वापस कैसे जाएं साहब?
रोजगार था वह छिन चुका
घर जो था वह छिन चुका
आसरा था वह छिन चुका
अब हम वापस कैसे जाएं?'
उसने दो बेंत फिर मारी पिछवाड़े पर
और बोला, 'बहुत जुबान चलती है तेरी
हमसे सवाल करता है
लगता है कि आज तेरे को कुछ बदा है।'
हमने कहा, 'साहब इस शहर को छोड़कर जाना बदा है हमारी किस्मत में'
उसने कहा, 'वापस जाता है या और लगाऊं?'
वापस लौट गये हम
पर जाते कहाँ?
पैदल चलते चलते एक पगडंडी की ओर बढ़ गये
जहां खाकी वर्दी का खौफ न हो।
खाकी वर्दी के खौफ से बचते हुए
डंडे की मार को याद करते हुए
रेल लाइन के सहारे चल पड़े
अपने गाँव की ओर.
चल पड़ा कड़वी यादों की गठरी लेकर
अपने गाँव की ओर
अपने बच्चों और पत्नी को लेकर।

न जाने कब पहुंचेंगे अपने गाँव
न जाने कैसे पहुंचेंगे अपने गाँव
जिद है कि पहुंचना है अपने गाँव
तो चल पड़े हम अपने पांव पांव।

चलते चलते
आखिर आ ही गया अपना गाँव
पहुंच गए हम भूखे प्यासे, थके मांदे
धूप में तपते, बारिश में भीगते
दोनों पावों में फफोलों के साथ।
अपने घर की शीतल छाँव में
आ गये हम किसी तरह

यह सही है कि यहां वह सब नहीं है
जो वहां था
लेकिन यहाँ दो मुट्ठी अनाज है,
एक मुट्ठी चैन तो है।
अपना घर, आखिर अपना होता है।

-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल





घर पहुंचने का सपना संजोये हुए,
रख दिए राह में लड़खड़ाते कदम.
ठाट जिनके बुने उसने लूटा हमें,
देर से ही सही टूटा झूठा भरम.
रेत ही रेत है दृष्टि की छोर तक,
जल रही है धरा जल रहा है गगन.
पांव पर बोझ टूटी हुई देह का,
रिसते छालों के खूं से खिलाते सुमन.
शुष्क अधरों की चाहत है दो बूंद जल,
तन की ख्वाहिश है वृक्षों की छाया सघन.
राह ठहरी हुई दूर हैं मंजिलें,
तन बदन को जलाती है बहती पवन.
भूख भी अन्त में सो गयी हार कर,
गोद भी ना मिली, है येे कैसा शयन.
चाह जीने की रुकने न देती कदम,
सिर्फ मंजिल पे अपनी लगे है नयन.
न कोई हाथ अब मुन्तजिर है मेरा,
जाम महफिल का मैं एक रीता हुआ.
मैं किसी रिंद के काम का अब नहीं,
स्वप्न बेनूर आंखों का बीता हुआ.


"अपना घर , आखिर अपना होता है"
उम्दा एवं दिल को छूने वाली रचना 🤔



(12)

07.08. 2020
 

अपना दर्द
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अपना दर्द
न बताने की बात है
न दिखाने की बात है,
दर्द सहने की बात है।

दर्द देने वाले दे देते हैं,
कहने वाले कह देते हैं,
दर्द देना सबको आता है।

दर्द सहते सहते
आदत सी पड़ गयी है अब,
अब दर्द बेअसर हो चला है।
लेकिन
दर्द में मज़ा लेना
अभी बाकी है सीखना।

-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल


(१३)

३१.१२.२०२०
 
यात्रा  
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अपने होने का अर्थ खोजने चला मैं
बेमतलब 
लेकिन बेख़ौफ़ 
अपने अतीत के पन्नों में.
 
नज़र आया मुझे, 
मेरा बचपन सिसकता हुआ सा
मेरी जवानी खिसकती हुई सी
मेरा बुढ़ापा धसकता हुआ सा.

फिर भी मेरा 
बचपन उमंग से भरा हुआ था
जवानी तरंग से परिपूर्ण थी 
हाँ, बुढ़ापा परेशां सा है.

अपना होना,
बस इतना सा था 
समय बीत गया 
जीवन रीत गया 
पुराना गीत गया.

अब अगली यात्रा पर चलो
चलते न बने तो भी चलो 
क्योंकि वहां जाने के लिए 
केवल पाँव ही नहीं,
पूरा शरीर चलता है, 
आग की लपटों में जलते हुए जाता है 
तब तन और मन को ठंडक मिलती है, 
चलो, 
सम्पूर्ण विश्रांति की ओर.

-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल 


(१४)
०५.०२.२०२१ 

मेरे पूर्वज

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मेरे पिता किसान न थे

उनके पिता भी किसान न थे

उनके पिता के पिता भी किसान न थे

उनके पिता के पिता के पिता किसान थे।

विंध्यप्रदेश के रौड़ गांव से 

अपनी पीठ पर लाद कर अनाज की बोरी

पन्द्रह मील दूर सतना की मंडी में लाते थे,

उनकी पीठ का दर्द मुझे अब महसूस हो रहा है।

क्या समय पलट कर इस तरह आता है?

क्या इस तरह लौट कर रुलाता है?


क्या मैं अब किसान नहीं रह गया?

तो फिर, 'मदर इंडिया' देखते समय

मेरी आँखों से आँसू क्यों झरते हैं?

दिल्ली की सीमा पर

ठंड से ठिठुरते किसानों की ठंडक से

मैं क्यों कांप रहा हूँ?


वैसे तो मैं किसान नहीं हूँ

लेकिन उस किसान का अंश तो हूँ

जिसने मेरे पिता के पिता के पिता का बीज

अपने खेत में बोया था।

-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

(१५) १४.०२.२०२१  


कोई सपने में आया 
मुझे जगाया 
'उठो-उठो'
मैं जगा. उठ बैठा 
निपट अँधेरा था सब ओर 
कोई नहीं दिखा 
मैं समझ गया 
सपनों का कोई भरोसा नहीं है
सपनों का क्या 
तुम्हें जगाकर 
खुद सो जाएंगे
बेफिक्र. 

-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल 


(16) 22.03.2021

द्वार :
===

द्वार बंद है?
न, न, खुला सा है
थोड़ी सी जगह है
घुसने की, संकरी सी
जाया जा सकता है भीतर।
द्वार के इस तरफ रह गये तो
इधर के ही रह जाओगे
भीतर उजाला है
भीतर संभावना है
भीतर झांक कर तो देखो
आशाओं के द्वीप जगमगा रहे हैं
मखमली घास पर चल कर तो देखो
आगे बढ़ने की राह दिखा रहे हैं।
रास्ता संकरा है?
कोई बात नहीं है
तुम घुसोगे तो जरा कष्ट होगा
लेकिन जब घुसोगे
तब दोनों बांहे फैला कर
द्वार को पूरा खोल देना
ताकि तुम्हारे पीछे खड़ा व्यक्ति
जो घुसने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है
वह बिना अवरोध के भीतर जा सके
वहां पसरे उजाले को
वहां की संभावनाओं को
अपनी बाहों में समेट सके।
देखो,
वह भीतर गया व्यक्ति
पलट कर तुम्हें धन्यवाद दे रहा है
क्योंकि
तुम तो द्वार के पास ही खड़े रह गये हो
किसी अन्य के लिए अपनी बाहें पसारे
द्वार खुला रखने के लिए।
-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल


बाहर की यात्रा का अपना सुख होता है। मन तरोताजा और मुग्ध हो जाता। यात्री बहुत कुछ पा जाता है आम तौर पर लेकिन वह यात्रा और उस यात्रा का सुख भीतर की यात्रा के अंशों में भी नहीं होता। वहां की यात्रा का यात्री लौटना नहीं चाहता, वहां जहां आनंद ही आनंद संव्याप्त है, यात्री वहीं का होकर रह जाना चाहता है नहीं बल्कि वहीं का होकर रह जाता है। गुरु याने पथदर्शक भी कितने निस्पृह होते हैं कि स्वयं की बजाय औरों को उस पथ का यात्री बनाने में लवलीनता से लगे रहते हैं और यह महत्तम कार्य एक सच्चा गुरू ही कर पाता है अन्यथा भटकाने वाले तो बहुतेरे हुआ करते हैं।
अच्छी और दिशाबोधक कविता के लिए बहुत बहुत 
बधाई

भय, संशय के पार, संभावनाओं के द्वार.

अद्भुत



(17)  21.4.2021

मुझे नहीं चाहिए :
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संंसार का सबसे बड़ा डर
मरने का डर 
पर मुझे नहीं लगता मौत का डर
क्योंकि मौत तो एक दिन आनी ही है 
पर डरता हूँ मैं 
वह जिंदा रहने और मरने के बीच का अंतराल 
कैसे सह पाऊंगा मैं? 

थोड़ी सी सांस के लिए तरसना 
थोड़ी सी प्राणवायु के लिए तरसना 
थोड़ी सी देखरेख के लिए तरसना 
घिसट-घिसट कर मरना 
तड़प-तड़प कर मरना 
सिसक-सिसक कर मरना
कैसे सह पाऊंगा मैं?

अस्पताल नहीं 
इंजेक्शन नहीं 
मेडिसिन नहीं 
आक्सीजन नहीं 
वेंटिलेटर नहीं 
तो क्या मुझे जिंदा रहने का हक नहीं? 

इससे अच्छा 
हृदय अचानक धड़कना बंद कर दे,
कम से कम आती हुई मौत से सामना तो नहीं होगा।
लेकिन क्या होना है मेरे साथ
मुझे क्या मालूम?
अन्जान हूँ अपने कल से 
भयभीत हूँ 
लेकिन सच कह रहा हूँ 
मैं मौत से नहीं डरता 
पर यह डरावनी मौत मुझे नहीं चाहिए
मुझे नहीं चाहिए. 

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(१८) ०२.०६.२०२१  

सपनों का क्या?
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सपनों का क्या?
अपनों का क्या?

आशाओं प्रत्याशाओं की 
सागर जैसी उठती लहरें 
उठती, बढ़ती 
किनारे आकर पसर जाती. 

सांसों की डोर से बंधे सपने
छटपटाते हैं टूट जाने को 
पसरते हैं अवसाद के अन्धकार 
आंसुओं के घूंट पी जाने को.

बेचैनी हताशा की 
सुलगती तपती दोपहरें 
ढलती, दरकती
और समा जाती रात्रि के अन्धकार में.

शिशु सा भोलापन
कड़कती जवानी 
उम्र के खिसकते पड़ाव 
और दायित्वों के बोझ
झपटते हैं असफलताओं पर 
मरते हैं, जी उठते हैं बेशरम.

क्या सूर्य फिर न उगेगा?
क्या धरती फिर न नाचेगी?
आंसुओं को पोछने 
उतरेगा आँचल आकाश से 
लहराएगा फिर
सपनों की तरह 
अपनों की तरह. 
==========
-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल 


(19)17.07.2021

मैं सोचता हूँ कि
मैं न होता 
तो क्या होता?
जो किसी के मरने के बाद होता है।
दुनिया चलती रहती है, 
बेखबर...
-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

  

(20) 30. 08. 2021

हमारा लोकतंत्र : 
---------------

यह कैसा लोकतंत्र है 
जहाँ लोक को लोग नहीं तंत्र चलाता है 
और, तंत्र को शासक का मंत्र चलाता है।
हमारे द्वारा चुने हुए लोग 
सदन में हाथ उठाने के लिए बैठते हैं 
दिमाग को तालों में बंद करके बैठते हैं 
हाँ में हाँ मिलाने के लिए वहां बैठते हैं 
नींद पूरी करने के लिए वहां बैठते हैं 
हाँ, केवल बैठने के लिए बैठते हैं।

उनके बैठने से संसद चलती है 
उनके बैठने से बहस चलती है 
उनके बैठने से कानून बनता है 
उनके बैठने से शासन चलता है 
लोकतंत्र की चमड़ी उधड़ती है
लोकतंत्र की हंसी उड़ती है।

लेकिन लाठी डंडे खाते हुए 
लोकतंत्र का उत्सव मनाते हुए 
हम मन ही मन खुश हो लेते हैं 
कि चलो, 
पांच साल बाद इन्हें सबक सिखाएंगे
फिर, नयी ऊंघने वाली सदन को चुनेंगे 
आखिर हमारे देश में लोकतंत्र तो है
भले ही नाम का है पर लोकतंत्र तो है।

लोकतंत्र हमारी खुशी का मंत्र बन गया है 
हमारी खुशी हमसे कौन छीन सकता है 
हमें लाश से लिपट कर रोना अच्छा लगता है।

-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल 

(21) 15.10.2021

मैं कौन?
---------
कौन राम 
कौन रावण
मैं मौन हूँ 
क्योंकि दोनों मैं हूँ।

किसी युग में राम ने रावण को पराजित किया था
इस युग में रावण राम को पछाड़ता हुआ दिख रहा है।
 
मेरा मन राम है और मस्तिष्क रावण
मेरा मन मस्तिष्क से क्यों हार रहा है 
इस प्रश्न का उत्तर कौन देगा?
 
किससे उत्तर मांगूं?
मन से या मस्तिष्क से।

-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

(22) 27.12.2021

हिचकी :
=====

परसों खाते समय हिचकी आयी
कल भी आयी थी
तो मेरे दिल ने कहा 
'लगता है कि कोई याद कर रहा है।'

आज फिर हिचकी आयी 
तो समझ आया कि
कोई याद नहीं करता मुझे 
गलतफहमी हुई है मुझे 
किसे फुर्सत है याद करने की 
सब अपनी ही फ़जीहतों से घिरे हुए हैं 
जब फुर्सत मिले उनसे 
तब कोई किसी को याद करे।

-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल


(23) 11.04.2022 

आज-अभी
मुझे कविता लिखने का आदेश हुआ है.
किसने दिया यह आदेश?
दिल ने.
पर दिल ने तो दिल्लगी कर दी
मुझ जैसे अकवि को कविता लिखने का काम सौंप दिया.
क्या करूँ?
किस पर कविता लिखूं?
खुद पर?
एक कविता में खुद का आकाश कैसे समाएगा?
उस पर?
एक कविता में उसका गुण-दोष कैसे समाएगा?
शहर पर?
एक कविता में अपने शहर को कैसे दिखाऊं?
देश पर?
एक कविता में अपने देश का हाल कैसे बताऊँ?
विश्व पर?
हाँ, विश्व पर लिख सकता हूँ
क्योंकि इस पर कविता लिखने के लिए एक शब्द ही पर्याप्त है
''हम".
-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

(24) 22:04:2022

आज पृथ्वी दिवस 
----------

हे पृथ्वी 
कितनी कृपालु हो तुम 
हमारा
भार सह रही हो तुम
अन्न देकर पोषित कर रही हो तुम 
जल देकर प्यास बुझा रही हो तुम 
वृक्षों से प्राणवायु दे रही हो तुम 

और हम?
तुम्हारी मिट्टी को नष्ट करने में लगे हैं 
तुम्हारे जल को नष्ट करने में लगे हैं 
तुम्हारे वृक्षों को नष्ट करने में लगे हैं 

फिर भी, 
माँ की तरह तुम
हमारे लिए करती ही रहती हो
हमारी मनमानी  
सहती ही रहती हो 
हे पृथ्वी माँ  
हमें क्षमा करना 
क्योंकि हमें मालूम नहीं है 
कि हम क्या क्या अन्याय कर रहे हैं 
तुम्हारी ममता के साथ।

-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल 

(२५) ०४.०७.२०२२ 

लिखो लिखो 
-------------

लिखो
लिखो
लिखो न!
क्या लिखूं?
संप्रदायों के बीच उठती दीवारों पर लिखूं
दोनों के बीच खिंचती तलवारों पर लिखूं
बेरहम तरीके से हुई हत्याओं पर लिखूं
बिना वजह बढ़ती हुई दूरियों पर लिखूं
'सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तां हमारा' हमने गाया था
'आज के इस इंसान को ये क्या हो गया' हमने पूछा था
'मेहमां जो हमारा होता है वो जान से प्यारा होता है' हमने सुना था
मेलजोल का जो सपना हमने मिलजुल कर देखा था
वह आज दिनोंदिन क्यों भसक रहा है, दरक रहा है, टूट रहा है?
क्या मिलेगा किसी की हत्या करके
किसी एक को धरती से कम करके
कम करना है तो मन के विकार को कम करो
कम करना है तो मन की दूरियों को कम करो
कम करना है तो मन की घृणा को कम करो
कम करना है तो मन के क्रोध को कम करो
दरअसल, हमने खुद को खुद से बांट लिया है
भाई को भाई की शक्ल पसंद नहीं
अपने पड़ोसी की शक्ल पसंद नहीं
दूसरी बिरादरी के लोग पसंद नहीं
दूसरे धर्म के लोग हमें पसंद नहीं
सवर्ण को दलित पसंद नहीं
दलित को सवर्ण पसंद नहीं
आखिर क्या पसंद है हमें
हमारा अहंकार?
किस बात का अहंकार?
जिस मिट्टी से आया है यह तन
उसी मिट्टी में मिल जाना है
कुछ पलों की जिंदगी मिली है
तो इन पलों को जिंदगी देने के लिए
लो, मैं अब लिख रहा हूँ
हम
ज्योति से ज्योति जलाते चलें
प्रेम की गंगा बहाते चलें।
-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल


(२६) १३.०७.२०२२ 

यदि मुझे लिखना आता
तो सबसे पहले यह लिखता
कि मत लिखो।
आखिर लिखा हुआ कितना पढ़ा जाएगा?
और पढ़ा हुआ कितना समझा जाएगा?
फिर समझा हुआ कितना टिकेगा?
पल दो पल।
लिखा हुआ भी क्षणभंगुर है
क्षणभंगुर जीवन की तरह।
-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

(२७) ०१.११.२०२२

जेल जेल होती है
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सजा छोटी हो या बड़ी
सजा सच्ची हो या झूठी
सजा कच्ची हो या पक्की
सजा सजा होती है
जेल जेल होती है
सीमेंट से बने पलंग
सामूहिक शयन
शयन वाले कमरे में मूत्रालय से उठती दुर्गन्ध
कुछ देर में सांसें भी अभ्यस्त हो जाती हैं
सुगन्ध और दुर्गन्ध का भेद टूट जाता है
केवल गन्ध रह जाती है नासिका में सिमटकर
बिना दरवाजे में मलत्याग
बिना दरवाजे में स्नान
लेकिन मुख्य दरवाजे पर तैनात प्रहरी
लेकिन मुख्य दरवाजे में तैनात मोटी छड़ें
बाहर झांकने की बंदिश
बाहर निकलने की बंदिश
खुली सांस लेने की बंदिश
जेल में खाने के नियम होते हैं
ओढ़ने बिछाने के नियम होते हैं
नियम सीखने की जगह है जेल
फिर भी जेल तो जेल होती है।

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(२८) ) 0६.0३.२०२३

मेरे बब्बा
=====
28 साल कोई उम्र होती है
विधुर हो जाने की?
तीन बच्चे
उनमें से एक दुधमुंहा
चली गयी दादी आकाश के उस पार
अब आकाश में स्थापित होकर देख रही है
अपने छोटे से बच्चे को रोते हुए
छलक रहा है उसका दूध
लेकिन पहुंच नहीं सकता बच्चे के मुंह में
क्योंकि जीवन सेतु टूट चूका है दोनों के बीच का
इधर बब्बा बच्चे को गोद में लिटा कर
बहला रहे हैं, 'चुप हो जा'
बच्चा भाषा समझता तो चुप हो जाता
फिर भी कैसे चुप होता
माँ के दूध से वंचित वह भूखा है
इसलिए रोए जा रहा है।
रो तो बब्बा भी रहे हैं
लेकिन बिना स्वर के
बिना आंसुओं के
फ़िक्र उन्हें केवल इसकी नहीं
इससे बड़े दो बच्चों की भी है
सांझ ढल चुकी है
वे दोनों खेल कर बाहर से आते होंगे
उन्हें भी भूख सताएगी।
बब्बा आटे में पानी घोल कर
छोटे से बच्चे को पिलाते हैं
फिर आटे में पानी डाल कर उसे सानते हैं
चूल्हे में लकड़ी लगा कर आग जलाते हैं
आटे की लोई तोड़ कर गदेलियों से थापते हैं
तवे पर रखकर सेंकते हैं
अंगारे में रखकर रोटी को फुलाने का निष्फल प्रयास करते हैं
बच्चे आ गए
रोटी में गुड़ लपेट कर उन्हें उनके रोने के पहले दे देते हैं
खाते-खाते बच्चे पूछते हैं
'बऊ कहाँ है?'
बब्बा बताते हैं
'मामा के घर गई है, आती होगी।'
पर मामा इतना बहरा है
कि उसे बच्चों का रुदन सुनाई नहीं देता
मामा इतना निष्ठुर है
कि उसे मेरी पीड़ा समझ में नहीं आती।
क्या करूँ मैं?
दूसरी ले आऊंगा तो सौतेली माँ होगी
बच्चों के साथ सौतेला व्यवहार करेगी
नहीं, ऐसा नहीं होने दूंगा
मैं ही इनकी माँ बनूंगा।
अचानक छोटे बच्चे को देखा
उसके शरीर को छुआ
शरीर ठंडा हो गया था
वह भी अनंत आकाश में
अपनी माँ के साथ बैठा
नीचे झांक रहा था
मेरे बब्बा को चुपचाप रोटी थापते-बनाते।

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(२९) १५.०३.२०२३

पंछियों का संसार
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हमें मील या किलोमीटर नहीं मालूम
हमें दिन माह या साल नहीं मालूम
हमें उड़ना आता है
सिर्फ उड़ना
हम उड़ते-उड़ते जा रहे हैं अपने गंतव्य की ओर
हमारा गंतव्य?
वही सुन्दर सा टापू
जहाँ हम किसी समय
एक बार चहचहाते हुए पहुंचते हैं
खुशियाँ मनाते हैं
टापू के चारों ओर फैले शांत जल के ऊपर
चक्कर लगाते हैं
वापस लौट कर जोड़े बनाकर प्रणयालाप करते हैं.
कौन समझेगा
हमारी उड़ान के परिश्रम
टापू के लिए हमारे प्रेम को
उस प्रतीक्षा को
कौन समझेगा ?
उड़ते-उड़ते हम सब पहुँच गए
अपने गंतव्य तक
लेकिन यह क्या?
हमारा टापू तो है
लेकिन वहां वह निर्जनता नहीं रही
कुछ अनजान लोग वहां पर हैं
हमारी धरती पर
उस धरती पर जिस पर हमारा स्वत्वाधिकार था
हमें विस्थापित करने के प्रयास में लगे थे लोग.
पक्षियों का झुण्ड
ऊपर-ऊपर मंडराता रहा
ऊपर से नीचे देखता रहा
दाएं-बाएं करता रहा
चक्कर काटता रहा
फिर उदास होकर
आकाश की ओर आशा के साथ देखता हुआ
वहां से उड़ चला किसी नए टापू की तलाश में
टू-टुर्र करते हुए.
-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

(30) 5.8. 2023

तो कोई बात बने
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इस तरह दूर-दूर रह के क्या होगा
मेरे करीब आओ तो कोई बात बने.

मेरे बारे में जमाने में बहुत सुना होगा
कुछ मेरी भी सुनो तो कोई बात बने.

वैसे भला इंसान नहीं हूं मैं फिर भी
मुझे जान जाओ तो कोई बात बने.

कुछ कमजोरियां तुममें हैं, इधर भी हैं
आपस में मिलान करें तो कोई बात बने.

दर्द के अलावा खुशियां भी हैं मेरे हिस्से में
आओ मिल-बैठकर बांटें तो कोई बात बने.

नासमझियों से सिर टकराना फिजूल है
समझबूझ कर बात करें तो कोई बात बने.

-द्वारिकाप्रसाद अग्रवाल

(31) 12:03:2024

डूबना उतराना तब होता है
जब पानी हो
मरना जीना तब होता है
जब जिंदगी हो.
न पानी है, न जिंदगी
बिना डूबे मर रहे हैं. 
हर दिशा में चीखें हैं 
पर कोई सुनने वाला नहीं
हमारी चीख उनकी चीखों से घुलमिल गई हैं
सब संकट में हैं, कौन है बचाने वाला?
घोषित बचाने वाला खुद चीख रहा है 
'बचाओ..बचाओ.'

-द्वारिकाप्रसाद अग्रवाल

(32) 30:03:2024

दांत टूथपेस्ट और ब्रश से साफ हो जाते हैं
तन साबुन और पानी से धुल जाता है
मैं इस खोज में लगा हुआ हूं
कि दिमाग में भरा कचरा कैसे साफ होगा?

जो कुछ पढ़ा सुना और सीखा
वह सब परत दर परत एकत्रित है 
मेरी खोपड़ी में.
नखरीली अदाएं
पथरीली समझ 
जहरीली सोच
मचमचाकर सब सवार हैं  
मेरी खोपड़ी में.

मैं दुखी हो गया हूं
यह बोझ अब मुझे सहन नहीं होता
मैं अपनी खोपड़ी को खाली करना चाहता हूँ 
लेकिन रोज कोई कुछ न कुछ कचरा और लाकर भर जाता है
खाली होने की गति धीमी है
जबकि भरने की तेज.

कोई तो उपाय होगा 
या इसी तरह जीवन भर बोझ उठाए मुझे जीना होगा?

पतझड़ मौसम आया है
वृक्ष हल्के हो गए हैं
नई कोंपले फूट रही हैं
उन्हें देखकर मैं पुलकित हूँ 
संभवतः मेरा समय आने वाला है
लेकिन प्रतीक्षा असहनीय हो रही है
कब आओगे मेरे पतझड़?

-द्वारिकाप्रसाद अग्रवाल 


(33) 05: 07: 2024

तुम इतने सीधे क्यों हो...

तुम इतने सीधे क्यों हो?
तुम्हारे सीधेपन की वजह से
सबने तुम्हें उपेक्षित किया
सबने तुम्हें अनसुना किया.
सबकी डांट सुने तुम
सबकी बात सुने तुम
सबकी घात सहे तुम.
तुम्हारे सीधेपन की आंच
मुझ तक भी पहुंची
उस तपिश से मैं भी झुलसी
पर मैं चुप रही
चुप रहना शायद मेरी नियति थी
या स्वभाव था
या संस्कार था
या मजबूरी थी
क्योंकि मैं तुम्हारी सहधर्मिणी थी
तुम्हारा स्वभाव मेरा बन गया.
सहते-सहते टूट गई थी मैं
सहने की कोई सीमा होती है
तब मैं विद्रोही सागर की तरह
उछल पड़ी
बिखर गयी
तुम्हारे सीधेपन की रेखा को लांघ कर
नेस्तनाबूद कर दिया
तुम्हारे सीधेपन के साम्राज्य को
लेकिन तुम फिर भी सीधे बने रहे
मैं बदल गयी
तुम न बदले
तुमने कुछ नहीं सीखा
न पलटकर जवाब देना
न उलटकर हमला करना
न अपनी अस्मिता की रक्षा करना
तुम अपरिवर्तित रहे
उनके साथ
सबके साथ
यहां तक मेरे साथ भी.

सवाल यह है
कि मैं सीधा क्यूं हूं?
मैं क्या करूं?
मैं अपनी मां की छाया हूं
जिसने अपना पूरा जीवन
न्योछावर कर दिया
इसी सीधेपन के गुण पर.
मुझे उसका सीधापन बहुत भाया
जिसकी मुझे बहुत याद आती है
उन यादों को गति देने के लिए
उसके गुण को अपना लिया है मैंने
मुझे गर्व है कि मैं अपनी मां का बेटा हूं
केवल अपनी मां का.
-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

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(34) 05.12.2024

आपके मन में क्या चल रहा है?
बहुत कुछ चल रहा है
अनवरत चलते ही रहता है
प्राण के साथ जुड़ा हुआ है
जब तक सांस चलेगी तब तक.
दुविधा लिखते समय आ खड़ी होती है
क्या लिखूं?
क्यों लिखूं?
कैसे लिखूं?
कब लिखूं?
कहां लिखूं?
लिखने को तो लिख दो लेकिन
कौन पढ़ेगा?
क्यों पढ़ेगा?
कैसे पढ़ेगा?
पढ़कर क्या सोचेगा?
पसंद करेगा?
नापसंद करेगा?
पता नहीं.
मुझे यह पता है
कि मेरे मन में जो आया
उसे लिखा
मेरा काम लिखना था,
मैंने लिखा
अब लिख कर छोड़ दिया
शब्द चल पड़े हैं अपनी अनंत यात्रा पर
वे कैसा असर पैदा करेंगे?
उनका क्या होगा?
मुझे क्या मालूम!
मुझसे पूछा गया था
आपके मन में क्या चल रहा है?
इसलिए जो चल रहा था
उसे जस-का‌-तस लिख दिया.
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(35) 22: 2: 2025

आँखें गजब किया करती हैं.
वह तो देखती हैं जो उन्हें दिखाई देता है
वह भी जो उन्हें दिखाई नहीं देता है
मन के गहरे में उतर कर मन की बात 
देख लिया करती हैं चुपके से
आँखें गजब किया करती हैं.

आंखें केवल देखती नहीं हैं
सुनती हैं, समझती हैं और बोलती भी हैं 
क्रोध और प्रेम की भाषा
और हौले से कह दिया करती हैं
आँखें गजब किया करती हैं.

काली-काली आंखों की गहराई 
भूरी-भूरी आंखों की तरुणाई 
छोटी-छोटी आंखों की चमक 
बड़ी-बड़ी आंखों की दमक 
आंखों ही आंखों में 
छुपे रहस्य बता देती हैं
आँखें गजब किया करती हैं.

आंखों के इस विस्तृत संसार में
इन्हीं की वज़ह से
हमारा नन्हा सा दिल धड़कता है
मधुर यादें भेज दिया करती हैं
आंखें गजब किया करती हैं.

_द्वारिकाप्रसाद अग्रवाल

(36) 02:03:2025

लकड़ी मौसम की नमी को सोख लेती है
इसलिए वह बरसात में फैलती है
लेकिन गर्मी में सिकुड़ती क्यों है?
क्या गर्माहट से संकोच होता है उसे?

-द्वारिकाप्रसाद अग्रवाल 

(37) 17:9:2025

रास्ता कहां जाता है?
हम उस पर जाते हैं
उस मंज़िल की तलाश में
जिसका हमें पता ही नहीं.
रास्ता जस-का-तस रुका हुआ है
लेकिन हम उस पर आ-जा रहे हैं.
आते-जाते हमारा समय भी जा रहा है
उसकी गति तेज है
लेकिन हमारी धीमी
समय बिना रास्ते के आगे बढ़ जाता है
उसे रास्ते की समझ नहीं है
और हम तो बस चलते जा रहे हैं
चरैवेति चरैवेति...
न उसे मंज़िल का पता है
न हमें.
इसलिए हम जहां से चले
वहीं वापस पहुंच जाते हैं
कोल्हू के बैल की तरह.
समय बीतने के बाद
पछतावा होता है
यह क्या किया
हम तो चल रहे थे
रास्ते ने हमें धोखा दिया.
रास्ते ने कहा
मैं तो निष्क्रिय हूं
मैंने क्या किया?
मैंने तुम्हें राह दी
चुनाव तुम्हारा था
क्यों चले तुम
मेरी छाती को रौंद कर?

- द्वारिकाप्रसाद अग्रवाल

(38) 05: 12: 02025

अब क्या बाकी है?
कुछ और करना बाकी है क्या
कुछ और देखना बाकी है क्या
जो करना था, न करना था, कर लिया
जो देखना था, न देखना था, देख लिया
चूहों की दौड़ में जीत कर किसे दिखाना है, चूहों को ही न?
मुझे दौड़ना पसंद है लेकिन चूहा बनकर नहीं
जीत गया तो भी मैं विजयी न रहूंगा
क्योंकि कई चूहे मुझसे पहले मुझसे कहीं आगे निकल चुके हैं.
मैं उस दौड़ में दौड़ना चाहता हूं जिसमें मैं अकेला दौड़ूं
जीतूं तो मैं
हारूं तो मैं
मेरी दौड़ में मुकाबला किसी और से नहीं,
खुद मुझसे है.
मेरी दौड़ जमीन पर नहीं
ऊपर आकाश की ओर है
मैं उस दौड़ में हूं जिसमें दौड़ना
मुझे सच में अच्छा लगता है
मुझमें आश्वस्ति का पुष्प खिलाता है.
अपना अहंकार छोड़कर
फिर जमीन पर उतरना है.
अपने मैं को मिटाना है
तब लगेगा, मैंने जीवन की दौड़ जीत ली.

*द्वारिकाप्रसाद अग्रवाल

(39) 17.03.2026

हमारी सांस :

जब तक सांस चल रही है
तब ही तक जीवित हो.
तब ही तक चल-फिर रहे हो
तब ही तक हंस-रो रहे हो
तब ही तक कह-सुन रहे हो
तब ही तक नाच-गा रहे हो.
उसके बाद बदबू फेंकता शरीर
देवता के समक्ष जलाई जाने वाली अगरबत्ती
मृत देह के आसपास सुलगाई जाती है
उसकी पूजा के लिए नहीं
बल्कि फैल रही बदबू को लांघने के लिए.
हटाओ, जलाओ, गाड़ो की दौड़भाग मची हुई है
शव को घर से बाहर निकालने की होड़ मची हुई है.
कुछ घंटों के सामूहिक प्रयास के बाद
अपने हाथ झाड़ते हुए वापस लौटते शवयात्री
यह भूल जाते हैं कि
एक दिन उनके साथ भी यही होना है.
उनका चलना-फिरना
उनका हंसना-रोना
उनका कहना-सुनना
उनका नाचना-गाना
यथावत जारी रहता है.
संभवतः इसे ही जिजीविषा कहते हैं.
-द्वारिकाप्रसाद अग्रवाल


(40) 23.05.2026

हमारा मित्र विहार :
शहर के बीचोबीच
शहर की भीड़ से दूर
कोलाहल से परे
किसी विशाल सागर में स्थित
मनोरम टापू जैसा
हमारा प्यारा मित्र विहार.
धान के खेत थे कभी
खेतों में मेड़ थी
जिसमें वर्षा का जल
भरा रहता था लबालब
धान के बीज अंकुरित होकर
हौले-हौले बढ़ा करते थे
समय बीतने पर हरी डालियों में में धान
अपने वजन से झुक जाया करता था
जैसे सबको नमस्कार कर रहा हो
पक जाने पर सबको बुलाता था
आओ, भले ही मुझे काट लो
लेकिन अपने पेट की भूख मिटा लो
वह अपने मिटने पर आनंदित था
चलो, मेरा अस्तित्व किसी के काम आया.
अचानक एक दिन
खेतों का मालिक भूस्वामी बन गया
उसने धान बोना बंद कर दिया
उसने धान से बोलना बंद कर दिया
उससे विरक्त हो गया
क्योंकि खेत के मुकाबले उसे
जमीन अधिक कीमती लग रही थी
धान उगलने वाली भूमि को
धन उगलने वाली जमीन बना दिया.
किसी अनपढ़ नक्शानवीस की मदद से
जमीन को कागज के नक्शे में बदल लिया
पढ़े-लिखे साहबों को खिला-पिला कर
कालोनी के प्लाट्स को वैध करवा लिया
किसी दूसरे की संभावित सड़क को जोड़कर
अपनी कालोनी का रास्ता बता दिया
शहर के कुछ भोले-भाले लोग
उस झांसे के झांसे में आ गए
और एक हरी-भरी कृषि भूमि में
हमारा मित्र विहार तन कर खड़ा हो गया.
अब समझ में आ रहा है कैसे जाल में फंस गए हम
नौ फुट के संकरे रास्ते से किस तरह आते-जाते हैं हम
पड़ोस के भूस्वामियों ने आने-जाने के रास्ते बंद कर दिए
हमारे देश की मानसिकता के अनुरूप बाधा खड़ी कर दी
निर्माण सामग्री का ट्रक अंदर लाने की कोई राह नहीं
फायर ब्रिगेड की गाड़ी अंदर लाने की कोई राह नहीं
नालियों का पानी बाहर जाने की कोई राह नहीं
बारिश का पानी बाहर जाने की कोई राह नहीं
नाली और बरसात का पानी धरती मैया सोख लेती है
कितनी दयालु है धरती जो हमारे दुख अपने आँचल में समेट लेती है.
फिर हम खुश हैं अपने प्यारे मित्र विहार में
बारिश में हवा से झूलते वृक्षों को देखना जंगल में मंगल जैसा लगता है
यहाँ की सुबह चिड़ियों की चहचहाहट के साथ मधुर रोशनी बिखेरती है
रंग-बिरंगी तितलियाँ फूलों पर उड़ती-कूदती-फांदती आती-जाती हैं
पार्क में बच्चे और युवा खेलते हैं और वृद्धाएं बतरस घोलती बैठती हैं
दिन-रात बिल्लियों की म्याँऊ-म्याँऊ और कुत्तों की भौं-भौं सुनाई देती हैं
कारों और बाइक के इंजन और हार्न की आवाज लगातार गुंजित रहती है
सब रहवासी एक-दूसरे को देखते रहते हैं, मन ही मन मुस्कुराते लेते हैं.
और क्या चाहिए साथ रहने के लिए?
कहते हैं कि जिस जगह पर इंसान रहता है, उससे प्यार हो ही जाता है
हमें भी प्यार हो गया है अपने मित्र विहार से
हमारा प्यारा मित्र विहार.



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