14 April 2017

छोटी शुरुआत किसी बड़े काम का संकेत है : रिपोर्ट

अभी तक ऐसा सिर्फ यहीं होता आ रहा है. अच्छे अकादमिक केन्द्रों में भी ऐसी तकनीक से पढने-पढ़ाने का काम नहीं होता. बिलासपुर में यह काम हो रहा है. यहाँ द्वारिका प्रसाद अग्रवाल इस काम को अंजाम दे रहे हैं. कुछ और भी लोग हैं लेकिन द्वारिका इस 'स्कूल' को स्थापित करने में अग्रणी हैं. द्वारिका के पास व्यक्तित्व विकास के सैकड़ों पाठ्यक्रम मौज़ूद हैं. नेतृत्व कला, भाषण कला, मानव सम्बन्ध प्रबंधन, संसदीय प्रणाली, सम्प्रेषण व्यवहार विज्ञान और न जाने क्या-क्या. इन कार्यक्रमों की अवधि अधिकतम दो दिवस है यानि आठ दूनी सोलह घंटे. ऐसे कार्यक्रमों को ही आधार मानें तो सोलह दाहम एक सौ साठ मानव घंटों का प्रशिक्षण कार्यक्रम. अपने आप में यह अद्भुत है. इसीलिए तो और कहीं यह नहीं हो रहा, कम से कम छत्तीसगढ़ में तो नहीं. प्रशिक्षण की इस तकनीक को विकसित किया है बिलासपुर ने. अब द्वारिका प्रसाद इस नयी प्रशिक्षण तकनीक का परचम लिए देशाटन कर रहे है. उत्तर भारत के 'हिंदी बेल्ट' में तो उनके नाम की धूम मची है.

इस सफलता का सबसे बड़ा कारण है लोगों खासकर युवा वर्ग में आयी जागृति. अब पुरानी तकनीक से कोई नहीं पढ़ना चाहता. एक ब्लैकबोर्ड की पृष्ठभूमि में खड़ा प्रशिक्षक आखिर कब तक प्रशिक्षुओं को बाँध सकता है. अधिकतम ४० मिनट. द्वारिका ने इस मिथक को तोड़ा है. चालीस घंटे तक प्रशिक्षुओं को बांधे रख सकते हैं. मजाल है कोई टस से मस हो जाये. द्वारिका के लिये यह बहुत आसान है. आसान इसलिए भी कि द्वारिका पूरे 'टूल्स' (औजारों) के साथ लैस होकर चलते हैं. और टूल्स क्या हैं? कुछ कागज़ के टुकड़े, ग्राफ पेपर, हैण्ड आउट्स, ओव्हर हेड प्रोजेक्टर, लकड़ी के गुटके, एक रबर की रिंग, बस यही सब. फिर प्रशिक्षुओं के बीच 'आइस ब्रेकिंग' (बर्फ तोडना नहीं, निस्तब्धता भंग करना), ग्रुप डिस्कशन, ग्रुप डायनेमिक्स, रोल प्ले इत्यादि उनके अतिरिक्त औजार हैं.

द्वारिका की प्रशिक्षण शैली निराली है. वे एकतरफा कभी नहीं बोलते. ग्रुप के लोगों की सक्रिय भागीदारी ही उनकी शैली की सफलता है. और ऐसा भी नहीं है कि आप मन में ठान लें मुझे चुप ही बैठना है. द्वारिका के प्रशिक्षण के दौरान आपको बोलना ही होगा बल्कि आप स्वतः बोल पड़ेंगे. यही तो शैली है. इसी का नाम नयी तकनीक है. द्वारिका की विचारोत्तेजक बातें मष्तिष्क को गहरे तक उद्वेलित करती है.

अब एक नमूना देखिये. कन्या महाविद्यालय में उद्यमिता वाले द्वारिका को पकड़ कर ले गए. द्वारिका उदार हैं, चले गए. उपस्थिति मात्र दस. उद्यमिता वालों को अंदाज़ा नहीं था कि महिला जागृति के नाम पर प्रशिक्षण देने का समय मार्च तो कतई नहीं होना चाहिए. कन्याएं तोता-रटन्त में व्यस्त होती हैं क्योंकि परीक्षा और उसका भूत सर पर सवार होता है. दस साहसी कन्याएं फिर भी हाज़िर. लेकिन पूर्व प्रशिक्षकों ने उनका 'भेजा' चाट डाला है. अब द्वारिका की बारी आती है. कन्याएं नाक-भौं सिकोड़ती हैं. एक हिम्मत कर पूछती है- 'सर! अब यह कम्युनिकेशन कितनी देर का है?' द्वारिका कन्या की नादानी पर मुस्काते हैं- 'सुनानेवाले की बात सुनने वाला सुनता रहे और समझता रहे, उतनी देर का.'

द्वारिका चालाक है. चालाक क्या हैं- प्रशिक्षुओं की नब्ज़ जानते हैं. बोलते हैं- 'हर आधे घंटे में पूछूँगा कि और कितना समय?' लडकियां सहमति में मुंडी हिलाती हैं. इसके बाद शुरू होता है द्वारिका का तिलिस्मी वाक्-संसार. अद्भुत प्रशिक्षण. द्वारिका को इसके बाद आधा-आधा करके तीन मौके मिले यानि डेढ़ घंटा और अंत में 'कन्क्लूज़न' के लिये पंद्रह मिनट और.

द्वारिका 'कम्युनिकेशन' समझाते हैं- इस समूचे संसार का दारोमदार सफलता पर टिका है. रात-दिन एक करके पढ़े लेकिन परीक्षा में 'पास' न हो सकी तो क्या फायदा? द्वारिका ने पूछा- 'आप सब यहाँ क्यों हैं?' लडकियां बोली- 'उद्योग लगाने के प्रारंभिक प्रशिक्षण के लिये.' द्वारिका कहते हैं- 'यह बहुत मुश्किल है. इस झांसे में न रहिए कि कल को आप किस बड़ी भारी फैक्ट्री की मालकिन बन जाएंगी.
बहुत छोटे पैमाने से शुरू करना होगा. यह मानो कि छोटी शुरुआत किसी बड़े काम का संकेत है. यह बिलकुल वैसा है कि आपको अगर एक किलोमीटर पैदल जाना हो तो एक कदम आगे बढ़ाना ही होगा. स्वेटर बुनो, अचार बनाओ, पापड़ बेलो, पतंग भी क्या बुरी है? कापियां-पुस्तक बांधो, सिलाई-बुनाई-कढ़ाई तो कहीं गयी नहीं. इनमें से एकाध को भी उद्यम के रूप में अपनाने की योजना बन गयी तो फिर लोगों से काम लेने का तरीका जानो. बस, यहीं प्रभावी सम्प्रेषण काम आएगा.'

उन्होंने दो बिंदु ब्लैकबोर्ड पर बनाए, और उसे जोड़कर सरल रेखा बना दी. पहला बिंदु 'अ' और दूसरा 'ब'. 'अ' ने कहा और 'ब' ने सुना. हो गया सम्प्रेषण. कितना सरल है! अब द्वारिका उसके गूढ़ रहस्य को समझाते हैं- 'सम्प्रेषण तब पूरा होगा जब प्रेषक और ग्राहक दोनों अच्छे होंगे. यानि बोलने वाले को बोलना और सुनने वाले को सुनना आना चाहिए.' उन्होंने प्रशिक्षण की रोचकता बकरार रखी, एक उदाहरण दिया-
'एक कन्या ने अपने भाई से बाहर जाते-जाते कहा- 'भैया, मैं अपनी सहेली के घर जा रही हूँ, रात को देर से आउंगी मम्मी को बता देना.'
भाई को भी जल्दी थी, उसने नौकर को बुलाया और कहा- 'मम्मी को बताना सरिता अपने दोस्त से मिलने गयी है, रात को देर से घर आएगी.'
नौकर ने कुछ देर बाद माता जी को सन्देश दिया- 'मां जी, सरिता अपने ब्वॉय फ्रेंड के घर गयी है, रात को देर से लौटेगी.'
अब क्या था ! घर भर में कोहराम मच गया.'

द्वारिका में यही खासियत है. उन्हें मालूम है कब क्या बोलना है इसलिए वे संकोच भी नहीं करते. उन्होंने एक अभ्यास कराया. पांच लड़कियों को कमरे से बाहर कर दिया हर एक को बुलाया और उसे तीन लाइनें पढ़ने के लिए दी. पहली से वह 'मैसेज' दूसरी को देने के लिए कहा. पहली ने पहली बार में ही गलतियाँ की. गलत सन्देश दूसरी ने सुना. उसने तीसरी को बताया, तीसरी ने चौथी को और चौथी ने जब पांचवी को सन्देश सुनाया तो मूल सन्देश के चिथड़े-चिथड़े हो चुके थे. मूल सन्देश में किसी लाल साड़ी पहने काली महिला का ज़िक्र था जो बदल कर अंत में काली साड़ी रह गया. सन्देश में किसी वैन का ज़िक्र था जो 'मारुति' में तब्दील हो गई. और गाड़ी का नंबर आते-आते चार अंकों से तीन अंकों पर ही समाप्त हो गया.
द्वारिका ने बताया कि कि दरअसल तीन लाइन के सन्देश को भी हम ध्यान से नहीं सुनते. उन्होंने संदेशों को पकड़ने के कुछ गुर बताए.

उन्होंने जाने क्यों, मुस्कुराते रहने पर बहुत जोर दिया. द्वारिका ने एक और तर्क दिया कि 'बोलें कम, सुनें ज्यादा.' अपनी बात सिद्ध करने के लिये उन्होंने ब्लैकबोर्ड पर एक चेहरा बनाया, स्वाभाविक रूप से एक मुंह बनाया और दो कान भी बनाए और कहा- 'यह ईश्वरीय व्यवस्था है वर्ना ईश्वर दो मुंह और एक कान बनाता.'

द्वारिका गज़ब के किस्सा-गो हैं. बिलकुल अपने आसपास के उदाहरणों को वे प्रशिक्षण के दौरान यूँ लपेटते हैं मानो पहले से तैयारी करके आये हों. द्वारिका ऐसे उदाहरणों में अपनी पत्नी 'माधुरी' का ज़िक्र अवश्य करते हैं. उस समय तो वे और भी मुखर हो जाते हैं जब उनकी श्रीमती श्रोताओं के बीच उपस्थित रहती हैं. यह द्वारिका की अपनी 'स्टाइल' है. वे प्रशिक्षण कक्ष की बेजान चीजों को भी प्रशिक्षण में शामिल कर लेते हैं. उन्हीं पड़ी हुई चीजों को वे उदाहरण बनाते हैं और वहीँ का वहीँ प्रयोग करके आगे बढ़ जाते हैं.

पौने दो घंटे बीत जाने के बाद अब गेंद द्वारिका के पास है. लडकियां जोर डालती हैं- 'कुछ देर और सर.' द्वारिका अब भाव खाते हैं लेकिन चेहरे पर पूरी मासूमियत और संजीदगी बिखेर कर कहते हैं- 'नहीं, आप लोगों की पढ़ाई का नुकसान होगा और मैं नहीं चाहता कि आपका सारा किया-कराया मिटटी में मिल जाये. आखिरकार, इस संसार में सफलता प्राप्त करना ही अंतिम लक्ष्य है और मैं भी उसका पक्षधर हूँ.'

- दैनिक 'समवेत शिखर' के रायपुर संस्करण में बुधवार, ६ अप्रैल १९९४ को प्रकाशित पत्रकार श्री राजेश दुआ की रिपोर्ट.