22 September 2021

मेरी चर्चा : 'मंतव्य -२ में :


















Jagdish Pathak
द्वारिका जी को निरंतर पढ़ता आ रहा हूं। उनकी लेखन शैली, भाव,भाषा सबको उनके बहुत करीब ले जाती है। ज़मीनी हकीकत से जोड़ती है।आम भाषा, बौद्धिकता का कहीं कोई प्रदर्शन नहीं। शब्दों की बाजीगरी से दूर। श्रेष्ठ।

Kamlesh Chandrakar
हर क्षेत्र के अनुभवों का अद्भुत खजाना और लेखन का करिश्माई अंदाज पाठक को अपने साथ गोताखोरी कराते जो आनंद दे जाता है वह अन्यत्र लगभग दुर्लभ है। पाठक एक साथ हलवाई से एक बड़े लेखक की इस यात्रा को देखकर हतप्रभ होते रहता है।
सादर अभिवादन के साथ।


'मंतव्य' के नये अंक में प्रकाशित 'बीकानेर का मज़ा' पढ़कर जितने पाठको के फोन आ रहे हैं, उतने तो पंकज चौधरी की कविताओं को पढ़कर भी नहीं आ रहे हैं 
 — with Dwarika Prasad Agrawal.

Ashutosh Dubey
'मंतव्य' -2 मिली. सुसम्पादित और पठनीय. अभी सुधा अरोड़ा जी का कमलेश्वर पर संस्मरण और द्वारिका प्रसाद अग्रवाल जी का रोचक और ईमानदार लेख पढ़ा है. पढ़ने को अभी तमाम चीज़ें बाकी हैं.Hareprakash Upadhyay को बधाई 

मुझे भी मंतव्य 2 मिला। Hareprakash Upadhyay बेहतरीन पत्रिका निकाल रहे हैं। अभी तक जो पढ़ा उसमें द्वारका प्रसाद अग्रवाल का गद्य अलग और रोचक है। इसलिए नहीं कि यह परनिंदा का रस देने वाला है बल्कि इसका खिलंदड़ापन सुखद है।


( अजीब साहित्यकारों की दुनिया है . अजीब साहित्यकारों का मेला ठेला है . कुछ दिन पहले रायपुर में साहित्य मेला हुआ .एक बीकनेर में भी हुआ .रायपुर वाला सरकारी था . बीकानेर वाला अकेले अशोक गुप्ता के दमखम से था . दोनों मेलों को लेकर अजब गजब प्रतिक्रियाएं पढ़ने को मिली . दो एक चार दिन पहले अशोक गुप्ता जी ने फोन लगाया कि वे फेसबुक से अप्रकाशित कवियों को लेकर जल्दी ही एक संग्रह छापने जा रहे हैं और ऐसे कवियों के नाम पूछे . मैंने कुछ नाम सुझा दिए . बातों बातों में मैंने `मंतव्य` में प्रकाशित उनके बारे में द्वारिकाप्रसाद अग्रवाल जी के लेख का उल्लेख किया . उन्हें `मंतव्य` मिला नहीं था . उसी लेख से ये अंश अब प्रस्तुत है . इसे बड़े मनोयोग से मेरे बेटे मुनीश ने टाइप किया है . इसमें बीकानेरी भुजिया के स्वाद जैसी भाषा-शैली का कमाल है. आप भी पढ़ें ) .

~मेरा नाम है अशोक गुप्ता ~

कोई व्यापारी यदि साहित्यानुरागी या कलाप्रेमी हो जाये तो समझ लीजिये कि उसे खुजली वाला कोढ़ हो गया है जो उसे चैन से रहने नहीं देगा . मैं स्वयं व्यापारियों की जमात का हूँ इसलिए अशोक गुप्ता जी के बारे में अभद्र भाषा का उपयोग करने की पात्रता रखता हूँ . `बीकानेर साहित्य और कला उत्सव` उसी दुखद बेचैनी की सुखद परिणिति है . जिस व्यापारी में अधिक सामर्थ्य होता है , वह स्वयं को साहित्यप्रेमी घोषित करवाने के लिए अपने वित्त सामर्थ्य को काम पर लगाता है और किसी ऐसे `पैदल` को तलाशता है जो उसको मंच पर स्थापित करे , उसकी जयजयकार करवाए और साहित्यिक और कलात्मक आधार स्तंभ बताये . जाहिर है ये सब जानते हैं कि `धन` ही धर्म का आधार है , राजनीति का आधार है , फिल्मों के निर्माण का आधार है , वैसे ही साहित्य और कला के वृहद् कार्यक्रमों का भी धन ही आधार है , परन्तु अशोक जी ने अपने बुद्धि चातुर्य से , धन- सामर्थ्य- बल के स्थान पर फेसबुक को अपना `पैदल ` बनाया और आप देखिये , ये अद्भुत सम्मलेन घटित हो गया .
अशोक गुप्ता मेरे जैसे व्यापारी और अन्य साहित्य कार्यक्रम आयोजकों के लिए एक प्रकाश-स्तंभ हो गए हैं जिन्होंने अपने धन का ही नहीं, वरन बुद्धि का प्रयोग करके इस आयोजन को सफल करके दिखा दिया है. मैं तो अत्यंत उत्साहित हो गया हूँ कि ऐसा ही धांसू कार्यक्रम अपने शहर बिलासपुर में भी करूँ. बस डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल का आसरा मिल जाये और सय्यद अयूब का सहारा . माँ कसम बीकानेर से एक इंच ऊपर कार्यक्रम करके बतायूंगा . किसी साहित्योमुखी धनिक की तलाश में हूँ , जैसे ही वो मुझे मिला , मैं गुरु चेला पटाता हूँ
अशोक जी एक आदर्श पुरुष हैं . उनसे बहुत कुछ सीखने लायक है . मैंने पूरे उत्सव में उन्हें उत्तेजित होते , हड़बड़ी करते या दौड़ते भागते नहीं देखा . हां , तनिक बेचैन से दिखाई पड़ते थे . इतना बड़ा आयोजन हो तो ऐसी बेचैनी स्वाभाविक है . मैं सबको तो पहचानता नहीं, परन्तु मैंने वहां अनुमान लगाया कि उत्सव में स्थानीय कार्यकर्ताओं की कमी थी और प्रतिभागी ही कार्यकर्ता की भूमिका में अवतरित हो गए थे . अशोक जी की एक पोस्ट से इन `दिहाड़ी वालों` को मालदीव घुमाने ले जाने का आश्वासन दिया है जिसे पढ़ कर मेरा मन बेहद दुखी हो गया. अब मेरी उम्र 67 वर्ष की होगई है आसपास का समझ आता है लेकिन दूरदृष्टि कमज़ोर हो गयी है अन्यथा मैं भी दस बीस कुर्सियां इधर उधर कर देता और अशोकजी के द्वारा प्रायोजित मालदीव यात्रा दल की सूची में मेरा भी नाम होता. सच में अखर गया.
मैं यह भी जानता हूँ के इतने बड़े में बेतहाशा खर्च होता है फिर `फ्री फण्ड` वाले भी कार्यक्रम में दांत नपोरते घुस जाते हैं, लोकल तो निशुल्क थे ही. जरूर अशोकजी का पर्स भी खाली हुआ होगा. अब चूँकि `वन मैन` शो था इसलिए कुछ कहा नहीं जा सकता पर अशोक जी अपनी सज्जनता के कारण अपनी जेब से काफी खर्च हो जाने के बावजूद,
मुझे उम्मीद है के वे अपने मुंह से किसीसे कुछ नहीं बताएंगे स्वयं सह लेंगे ...
 — with Hareprakash Upadhyay and Ashok Gupta.


नए साल में जब चंद दिन शेष हैं, 'मंतव्य' के नए संस्करण से रूबरू कराने के लिए एक बार फिर शुक्रिया Hareprakash Upadhyay जी। मन्तव्य की बड़ी खासियत यह लगी कि यह कई नए और उदीयमान लेखकों के लिए बेहतरीन प्लेटफॉर्म बनकर उभरा है। इस क्रम में सबसे पहले हेमा दीक्षित की कहानी 'मीरा क्रिस्तान' का जिक्र करूंगी (जिसके संदर्भ में कहा गया है कि यह लेखिका की पहली कहानी है)। धर्मांतरण और घर वापसी के शोर वाले समय में यह कहानी बेतरह सामयिक तो है ही, मन में उतर और ठहर भी जाती है। दूसरा नाम द्वारिका प्रसाद अग्रवाल जी का लेना चाहूंगी, जिन्होंने खुद अपने बारे में लिखा है कि वैसे तो साहित्य में मेरा कोई योगदान नहीं रहा। मैंने कभी किसी साहित्यिक कार्यक्रम में भाग भी नहीं लिया था, पर सदेह उठाया 'बीकानेर का मजा' उन्होंने जिस मजेदार अंदाज में मंतव्य में बखाना है, पढ़कर मजा आ गया। इनके अलावा राजेश्वर वशिष्ठ जी की कविताओं में नई तरह की गूंज हैं, खासकर वृशाली...। वहीं पंकज चौधरी की कविता में फ्रस्टेटियाए पुरुष की पीड़ा साफ दिखी।